संसार पर कवितावां

‘संसरति इति संसारः’—अर्थात

जो लगातार गतिशील है, वही संसार है। भारतीय चिंतनधारा में जीव, जगत और ब्रहम पर पर्याप्त विचार किया गया है। संसार का सामान्य अर्थ विश्व, इहलोक, जीवन का जंजाल, गृहस्थी, घर-संसार, दृश्य जगत आदि है। इस चयन में संसार और इसकी इहलीलाओं को विषय बनाती कविताओं का संकलन किया गया है।

कविता65

सतिये नै सीख

सत्येंद्र चारण

बीजी दुनियां थारी-म्हारी

राजूराम बिजारणियां

मेळो

सत्येंद्र चारण

हुवै रंग हजार

सांवर दइया

बसंत कद आवसी

सत्यदीप ‘अपनत्व’

म्हारै सारू

दुलाराम सहारण

मौत

सत्यप्रकाश जोशी

नीं सीखूंला म्हैं

संजय आचार्य 'वरुण'

रंगमंच

लक्ष्मीनारायण रंगा

सुपनौ अर जथारथ

वाज़िद हसन काजी

जगत रो मिजाज

रेणुका व्यास 'नीलम'

बाटियो

घनश्याम नाथ कच्छावा

विश्वसुन्दरी रै मिस

अन्नाराम ‘सुदामा'

जथाजोग

मणि मधुकर

आपां भी चालस्यां

राधेश्याम 'अटल'

आखतौ

मणि मधुकर

धुंवाड़ौ

उपेन्द्र अणु

बैठी बैठी बोली यूं

मोहम्मद सदीक

सबद चिरकली

भगवती लाल व्यास

कुण है वो

मदन गोपाल लढ़ा

आदमी नै बईरु

दीपिका दीक्षित

अेक मूरती

कवि कांति बोड़ा

इण भांत राखी थूं

मालचंद तिवाड़ी

सबद : अेक

प्रमोद कुमार शर्मा

प्रीत पाळता रिया

मुकेश आमेरा

सुखसाज

मणि मधुकर

मां

तेजस मुंगेरिया

कलम उठा

इरशाद अज़ीज़

जोत उजाळी

कुन्दन माली

बंतळ

ऋतुप्रिया

परोपकार

भगवती प्रसाद चौधरी

प्रीत पांण

दुलाराम सहारण

मा

कैलाश मंडेला

बतळावण

इन्द्र प्रकाश श्रीमाली

पड़दो

रचना शेखावत

हथियार अर थारी कूंख

अर्जुनदेव चारण

स्रिस्टी रो चक्को

पूनमचंद गोदारा

म्हारो भोळो जीवड़ो

प्रेमजी ‘प्रेम’

रेत रो हेत

ओम पुरोहित ‘कागद’

नारीहीण दुनिया

कपिलदेव आर्य

रोईड़ौ

मणि मधुकर

बदळती मानता

सुशीला ढाका

भूलणो

सत्यप्रकाश जोशी

भूख रो धरम

सत्येंद्र चारण