वैवार पर कवितावां

वैवार सबद लोक में सांवठौ

अनै प्रतिबद्ध अर्थ राखै। वैवार सूं लोक रा आचार बणै अर बिगड़ै। अठै प्रस्तुत रचनावां वैवार रै वैवार माथै केन्द्रित है।

कविता231

मार्क्स

शिव बोधि

राजस्थानी बातां

रामाराम चौधरी

कोराना रो कहर

रामाराम चौधरी

मिजाज

कैलाश मंडेला

म्हारी उमर

रामाराम चौधरी

म्हूं के बोलूं

अखिलेश्वर

छिपकल्यां

नंदकिशोर सोमानी ‘स्नेह'

कठै सूं लावू?

सिया चौधरी

जका बखत नै सैसी

वासु आचार्य

बड़बोल्यो

कैलाश मंडेला

हेली

ताऊ शेखावटी

मन री गांठां

कमला जैन

आसा सूं मुलाकात...

रामजीवण सारस्वत ‘जीवण’

कारज

रमेश मयंक

सगती लछमी सार

ब्रजनारायण पुरोहित

परदेसी

सोनी सांवरमल

जगावण री बात कर

श्याम निर्मोही

हाथ री बात

अर्जुनसिंह शेखावत

कांकर

मोनिका गौड़

कसक

किरण बाला 'किरन'

मनड़ै रो मारग

कृष्णा आचार्य

बंस

मणि मधुकर

प्रेम

कुलदीप पारीक 'दीप'

सूरज की किताब

प्रेमचन्द्र गोस्वामी

जमानौ बदळ ग्यौ

छगनराज राव 'दीप'

मन री बातां

मेघराज मुकुल

सगपण

ओम नागर

मानखै री बेल

श्रीमाली श्रीवल्लभ घोष

सावळ कोनीं

राजेन्द्र बारहठ

जणी नै रुखाळ

अब्दुल वहीद कमल

मुरधर केवै

घनश्याम लाल रांकावत

कर्म रै बिना

महेन्द्रसिंघ महलान

पाछौ कुण आसी...

नीरज दइया

सराध

कालू खां

बात कठे

कृष्णा आचार्य

माउ तरेसा कै माउ तरैसी

ब्रज नारायण कौशिक

रंगायेला हेंयार

नीता चौबीसा

कुण मांनै

फतहलाल गुर्जर 'अनोखा'

सीख

रामजीलाल घोड़ेला 'भारती'

चुड़लौ

विवेकदीप बौद्ध

खुद रो दम

कैलाश मंडेला

पित्तर सोवै

राजेश कुमार व्यास

भूख भाव

प्रहलादराय पारीक

पूगसी कठै?

रेणुका व्यास 'नीलम'

मैणत री बूंदां मांय

दीपचन्द सुथार

दूजी पीड़ मुलावै

सीताराम महर्षि