वैवार पर ग़ज़ल

वैवार सबद लोक में सांवठौ

अनै प्रतिबद्ध अर्थ राखै। वैवार सूं लोक रा आचार बणै अर बिगड़ै। अठै प्रस्तुत रचनावां वैवार रै वैवार माथै केन्द्रित है।

ग़ज़ल14

बचता रीज्यो

प्रेमजी ‘प्रेम’

सब सूँ पैला आवै चाय

रजा मोहम्मद खान

बूरो मत ना मान जो

अरविन्द चूरुवी

आखर रै ओळै दोळै

रतन सिंह चांपावत

तन सूरज रौ काळौ कित्तौक

पुरुषोत्तम छंगाणी

किणी नै बणाय थूं आपरो,

सुशील एम.व्यास

बिना बुलाया अण चाया म्हे

गौरीशंकर आचार्य ‘अरूण’

कपट कळदार घणा

लालदास 'राकेश'