वैवार पर मुक्तक

वैवार सबद लोक में सांवठौ

अनै प्रतिबद्ध अर्थ राखै। वैवार सूं लोक रा आचार बणै अर बिगड़ै। अठै प्रस्तुत रचनावां वैवार रै वैवार माथै केन्द्रित है।

मुक्तक4

इण धरती री भोळी मायड़

भगवती लाल व्यास

रात पाछली आंगण-आंगण

भगवती लाल व्यास