समै पर कवितावां

समय अनुभव का सातत्य

है, जिसमें घटनाएँ भविष्य से वर्तमान में गुज़रती हुई भूत की ओर गमन करती हैं। धर्म, दर्शन और विज्ञान में समय प्रमुख अध्ययन का विषय रहा है। भारतीय दर्शन में ब्रह्मांड के लगातार सृजन, विनाश और पुनर्सृजन के कालचक्र से गुज़रते रहने की परिकल्पना की गई है। प्रस्तुत चयन में समय विषयक कविताओं का संकलन किया गया है।

कविता292

समै रो संताप

नीतू शर्मा

ओळूं

आईदान सिंह भाटी

काळ

मणि मधुकर

आ बैठ बात करां - 1

रामस्वरूप किसान

बीज नै उगणो पड़सी

भीम पांडिया

काळ

किशन ‘प्रणय’

रंग विहूणौ

महेंद्रसिंह छायण

घट्टी

मुकुट मणिराज

घर अर फळसौ

आईदान सिंह भाटी

संबंधा रा डोरा

अनुश्री राठौड़

बगत

कन्हैयालाल सेठिया

बात कोनी

उषा राजश्री राठौड़

यक्ष सवाल

रेवंत दान बारहठ

थारी अर म्हारी बात

आईदान सिंह भाटी

काळ

कन्हैयालाल सेठिया

बूढ़ी डोकरी

पवन सिहाग 'अनाम'

खुली आंख रा सुपना

नरेंद्र व्यास

दूजी पीड़ मुलावै

सीताराम महर्षि

घड़ी ना कांटा

नरेन्द्रपाल जैन

आंख्यां

इरशाद अज़ीज़

लेनिन रै बखत

निकोलाइ अेस्येयेव

ल्यो करल्यां बात

बद्रीलाल मेहरादित्य

आवणियो काल

गोविन्द शंकर कुरुप

खोज

नजाबुलो एस. नदेवल

थाकैलौ

फ़ेंटन जॉनसन

आपरी चूंच

यादवेन्द्र शर्मा 'चन्द्र'

दस दूहा : आंख माथै

कुंदन सिंह 'सजल'

बखत आयग्यो भाई! भाई!

गिरधरदान रतनू दासोड़ी

इतिहास-पख

पारस अरोड़ा

धुंवाड़ौ

उपेन्द्र अणु

म्हारो भायलो

रतन ‘राहगीर’

रोई रा रूंख

रामस्वरूप ‘परेश’

जे थै अगन हौ

मुलदागालीयेव

आपरा आलोचकां सूं

अलेक्जांदर त्वारदोवस्की

कद मिलसी आजादी

शंकर दान चारण

गंदी हवा

चंद्रशेखर अरोड़ा

एक अंत बिहूण जातरा

रामस्वरूप ‘परेश’

उठ बटाऊ

नमामीशंकर आचार्य

अंगूठो

नीरज दइया

परेम का गीत

कृष्णा कुमारी ‘कमसिन’

भेडां

श्याम महर्षि

म्हैं नीं

तेजसिंह जोधा

काळ

गोरधन सिंह शेखावत

सुख सागर री लकड़ी

मालचंद तिवाड़ी

भायलै नै कागद

अल्फ्रेड प्रागनेल