समै पर कवितावां

समय अनुभव का सातत्य

है, जिसमें घटनाएँ भविष्य से वर्तमान में गुज़रती हुई भूत की ओर गमन करती हैं। धर्म, दर्शन और विज्ञान में समय प्रमुख अध्ययन का विषय रहा है। भारतीय दर्शन में ब्रह्मांड के लगातार सृजन, विनाश और पुनर्सृजन के कालचक्र से गुज़रते रहने की परिकल्पना की गई है। प्रस्तुत चयन में समय विषयक कविताओं का संकलन किया गया है।

कविता318

आ बैठ बात करां - 1

रामस्वरूप किसान

ओळूं

आईदान सिंह भाटी

समै रो संताप

नीतू शर्मा

काळ

मणि मधुकर

लालू दादो

चन्द्र प्रकाश देवल

यक्ष सवाल

रेवंत दान बारहठ

आ बैठ बात करां - 7

रामस्वरूप किसान

संबंधा रा डोरा

अनुश्री राठौड़

बगत

कन्हैयालाल सेठिया

बात कोनी

उषा राजश्री राठौड़

थारी अर म्हारी बात

आईदान सिंह भाटी

काळ

कन्हैयालाल सेठिया

बूढ़ी डोकरी

पवन सिहाग 'अनाम'

घट्टी

मुकुट मणिराज

घर अर फळसौ

आईदान सिंह भाटी

बीज नै उगणो पड़सी

भीम पांडिया

रंग विहूणौ

महेंद्रसिंह छायण

काळ

किशन ‘प्रणय’

जद म्हूँ न्हँ रहैउँगो

हेमन्त गुप्ता पंकज

आंधौजुग

शंभुदान मेहडू

रोहिडै रो फूल

रतन ‘राहगीर’

पतियारो

नवनीत पाण्डे

अैड़ै ऊंचै क्षणां में

व्लादिमीर मायकोव्स्की

आखर

अर्जुनदेव चारण

जिनगाणी

श्याम सुन्दर टेलर

समै रो पगफेरो

शिवराज छंगाणी

नेमप्लेट

महेन्द्र भानावत

बखत रौ मोल

शकुंतला अग्रवाल 'शकुन'

खुदकुसी रै खिलाफ

कृष्णगोपाल शर्मा

काळौ घोड़ो

मणि मधुकर

ओ मानखो बीत्यो जावै

मुखराम माकड़ ‘माहिर’

रमतियो

यादवेन्द्र शर्मा 'चन्द्र'

ऊनाळै रो बाग

अन्ना अख्मातोवा

सज रैया है कैक्टस

किशोर कुमार निर्वाण

जूण

बेणुगोपाल भट्टड़

कठै

भगवती प्रसाद चौधरी

कवी

रेम्को कैंपर्ट

पिंड पाळै मन

ओम पुरोहित ‘कागद’

बडेरां री पीड़

अैल्फ़ाज़िना स्टार्नी

टैम निकल जावै ला

बाबूलाल संखलेचा

उण वगत अर इण वगत

फ्रेडरिक होल्डरलिन

काळ रा तीन ठांव

नन्दकिशोर चतुर्वेदी