समै पर कवितावां

समय अनुभव का सातत्य

है, जिसमें घटनाएँ भविष्य से वर्तमान में गुज़रती हुई भूत की ओर गमन करती हैं। धर्म, दर्शन और विज्ञान में समय प्रमुख अध्ययन का विषय रहा है। भारतीय दर्शन में ब्रह्मांड के लगातार सृजन, विनाश और पुनर्सृजन के कालचक्र से गुज़रते रहने की परिकल्पना की गई है। प्रस्तुत चयन में समय विषयक कविताओं का संकलन किया गया है।

कविता278

समै रो संताप

नीतू शर्मा

ओळूं

आईदान सिंह भाटी

काळ

मणि मधुकर

आ बैठ बात करां - 1

रामस्वरूप किसान

रंग विहूणौ

महेंद्रसिंह छायण

घट्टी

मुकुट मणिराज

काळ

किशन ‘प्रणय’

बात कोनी

उषा राजश्री राठौड़

बीज नै उगणो पड़सी

भीम पांडिया

संबंधा रा डोरा

अनुश्री राठौड़

बगत

कन्हैयालाल सेठिया

काळ

कन्हैयालाल सेठिया

बूढ़ी डोकरी

पवन सिहाग 'अनाम'

थारी अर म्हारी बात

आईदान सिंह भाटी

घर अर फळसौ

आईदान सिंह भाटी

बाई

विनोद स्वामी

चेत मानखा चेत

मोहम्मद सदीक

ओ टूकड़ौ

रामस्वरूप किसान

बिद्रोही

फ्रैंक ए. कॉलिमोर

मिनख रौ पगफेरौ

नंद भारद्वाज

बगत री बात

दीपचन्द सुथार

हेली

ताऊ शेखावटी

थे कितणा भी चीखो

बनवारीलाल अग्रवाल

पांडुलिपि

महेन्द्र भानावत

जात निसरगी

किशोर कल्पनाकान्त

कळजुग नो ज़मारो आव्यौ

राम पंचाल भारतीय

कवि अर आगीवाण

तेजसिंह जोधा

आभै रै उण पार

शंकरसिंह राजपुरोहित

नरकवाड़ौ

मणि मधुकर

बदळाव री हूंक

रतन ‘राहगीर’

अघोरी काळ

कन्हैयालाल सेठिया

अड़ अर बगत सूं लड़

मनोज पुरोहित 'अनंत'

जुग रो हेलो

कल्याणसिंह राजावत

बगत

देवकरण जोशी 'दीपक'

टैम

गौरीशंकर निमिवाळ

उबाणै पांव

गोविन्द हाँकला

भुलाव

पॉल बोरम

आसरो

प्रभुदयाल मोठसरा

तौले जूण

संदीप 'निर्भय'

स्यात

सुरेश जोशी

थाकैलौ

फ़ेंटन जॉनसन

आपरी चूंच

यादवेन्द्र शर्मा 'चन्द्र'

दस दूहा : आंख माथै

कुंदन सिंह 'सजल'

बखत आयग्यो भाई! भाई!

गिरधरदान रतनू दासोड़ी

इतिहास-पख

पारस अरोड़ा