समै पर कवितावां

समय अनुभव का सातत्य

है, जिसमें घटनाएँ भविष्य से वर्तमान में गुज़रती हुई भूत की ओर गमन करती हैं। धर्म, दर्शन और विज्ञान में समय प्रमुख अध्ययन का विषय रहा है। भारतीय दर्शन में ब्रह्मांड के लगातार सृजन, विनाश और पुनर्सृजन के कालचक्र से गुज़रते रहने की परिकल्पना की गई है। प्रस्तुत चयन में समय विषयक कविताओं का संकलन किया गया है।

कविता386

समै रो संताप

नीतू शर्मा

ओळूं

आईदान सिंह भाटी

आ बैठ बात करां - 1

रामस्वरूप किसान

लालू दादो

चन्द्र प्रकाश देवल

काळ

मणि मधुकर

बाई

विनोद स्वामी

रंग विहूणौ

महेंद्रसिंह छायण

काळ

किशन ‘प्रणय’

बीज नै उगणो पड़सी

भीम पांडिया

आ बैठ बात करां - 7

रामस्वरूप किसान

यक्ष सवाल

रेवंत दान बारहठ

संबंधा रा डोरा

अनुश्री राठौड़

बगत

कन्हैयालाल सेठिया

बात कोनी

उषा राजश्री राठौड़

बूढ़ी डोकरी

पवन सिहाग 'अनाम'

थारी अर म्हारी बात

आईदान सिंह भाटी

काळ

कन्हैयालाल सेठिया

घट्टी

मुकुट मणिराज

घर अर फळसौ

आईदान सिंह भाटी

सरजण

पारस अरोड़ा

खुली आंख रा सुपना

नरेंद्र व्यास

दूजी पीड़ मुलावै

सीताराम महर्षि

घड़ी ना कांटा

नरेन्द्रपाल जैन

आंख्यां

इरशाद अज़ीज़

लेनिन रै बखत

निकोलाइ अेस्येयेव

ल्यो करल्यां बात

बद्रीलाल मेहरादित्य

नुंवै बरस रौ दिन

माओत्से तुङ्ग

चेत मानखा चेत

मोहम्मद सदीक

ओ टूकड़ौ

रामस्वरूप किसान

बिद्रोही

फ्रैंक ए. कॉलिमोर

मिनख रौ पगफेरौ

नंद भारद्वाज

बगत री बात

दीपचन्द सुथार

हेली

ताऊ शेखावटी

थे कितणा भी चीखो

बनवारीलाल अग्रवाल

पांडुलिपि

महेन्द्र भानावत

जात निसरगी

किशोर कल्पनाकान्त

कळजुग नो ज़मारो आव्यौ

राम पंचाल भारतीय

सूरज

श्याम महर्षि

कवि अर आगीवाण

तेजसिंह जोधा

आभै रै उण पार

शंकरसिंह राजपुरोहित

कुण नै व्यथा कैवां

कुंदन सिंह 'सजल'

मीरां

सन्तोष मायामोहन

नरकवाड़ौ

मणि मधुकर

बदळाव री हूंक

रतन ‘राहगीर’