कुदरत पर कवितावां

प्रकृति-चित्रण काव्य

की मूल प्रवृत्तियों में से एक रही है। काव्य में आलंबन, उद्दीपन, उपमान, पृष्ठभूमि, प्रतीक, अलंकार, उपदेश, दूती, बिंब-प्रतिबिंब, मानवीकरण, रहस्य, मानवीय भावनाओं का आरोपण आदि कई प्रकार से प्रकृति-वर्णन सजीव होता रहा है। इस चयन में प्रस्तुत है—प्रकृति विषयक कविताओं का एक विशिष्ट संकलन।

कविता117

प्रेम री परीभाषा

सत्येंद्र चारण

डांडी रौ उथळाव

तेजस मुंगेरिया

अेकला बळै

आशीष बिहानी

परेम

अंजु कल्याणवत

धरती'र भासा!

कन्हैयालाल सेठिया

म्हारौ गांव

हरमन चौहान

ठूंठ

गजेसिंह राजपुरोहित

काळ

कन्हैयालाल सेठिया

अै कठफोड़ा

शिवराज छंगाणी

नंग धड़ंग अरावळी

कन्हैयालाल सेठिया

ध्वनि परस

रामस्वरूप किसान

टीब्बा

अंजु कल्याणवत

सौरम रो भभको

रामस्वरूप किसान

तपत अर किसान

बिशनाराम स्वामी

उल्थो

सत्येंद्र चारण

घांस छूं म्हूं

सी. एल. सांखला

सार

रावत सारस्वत

कुदरत रौ मिनख

शंभुदान मेहडू

सींव अर सपनो

कन्हैयालाल ‘वक्र’

संझ्या : तीन चतराम

प्रेमजी ‘प्रेम’

लओशान दर्रो

माओत्से तुङ्ग

आसान कोनी

सुमन पड़िहार

बीज अर माटी री बंतळ

गजादान चारण ‘शक्तिसुत’

प्रणय

ओमप्रकाश गर्ग 'मधुप'

सूरज

इरशाद अज़ीज़

उजास रै आंगणै

रतन ‘राहगीर’

रचीजै सिस्टी

सन्तोष मायामोहन

रब राखै सो रैसी राम

मोहम्मद सदीक

स्यात

सुरेश जोशी

पखेरू नापे आकास

इन्द्र प्रकाश श्रीमाली

म्हारौ मारग

सुधीर राखेचा

बात

भारती पुरोहित

सुकाल रो सूरज

फतहलाल गुर्जर 'अनोखा'

कुदरत रौ सराप

धनंजया अमरावत

ओरण

सत्येंद्र चारण

एकलो हाथ

भगवती लाल व्यास

सीप

चंद्र सिंह बिरकाळी

नदी

इरशाद अज़ीज़

म्हारो मन्न

सत्येंद्र चारण

अंतस् मीठास

शिवराज छंगाणी

पूजा जोग

राधेश्याम 'अटल'

म्हे गीतां का बिणजारा

बनवारीलाल मिश्र ‘सुमन’

आसरौ

शिवराज छंगाणी

जोवो तो सरी

पुरुषोत्तम छंगाणी

हे! कुनामी, कुकर्‌मी-सुनामी

तारालक्ष्मण गहलोत

गीतां को गेलो

प्रेमजी ‘प्रेम’