कुदरत पर कवितावां

प्रकृति-चित्रण काव्य

की मूल प्रवृत्तियों में से एक रही है। काव्य में आलंबन, उद्दीपन, उपमान, पृष्ठभूमि, प्रतीक, अलंकार, उपदेश, दूती, बिंब-प्रतिबिंब, मानवीकरण, रहस्य, मानवीय भावनाओं का आरोपण आदि कई प्रकार से प्रकृति-वर्णन सजीव होता रहा है। इस चयन में प्रस्तुत है—प्रकृति विषयक कविताओं का एक विशिष्ट संकलन।

कविता103

परेम

अंजु कल्याणवत

प्रेम री परीभाषा

सत्येंद्र चारण

डांडी रौ उथळाव

तेजस मुंगेरिया

अेकला बळै

आशीष बिहानी

नंग धड़ंग अरावळी

कन्हैयालाल सेठिया

टीब्बा

अंजु कल्याणवत

ठूंठ

गजेसिंह राजपुरोहित

काळ

कन्हैयालाल सेठिया

अै कठफोड़ा

शिवराज छंगाणी

धरती'र भासा!

कन्हैयालाल सेठिया

रब राखै सो रैसी राम

मोहम्मद सदीक

स्यात

सुरेश जोशी

पखेरू नापे आकास

इन्द्र प्रकाश श्रीमाली

म्हारौ मारग

सुधीर राखेचा

बात

भारती पुरोहित

सुकाल रो सूरज

फतहलाल गुर्जर 'अनोखा'

कुदरत रौ सराप

धनंजया अमरावत

ओरण

सत्येंद्र चारण

एकलो हाथ

भगवती लाल व्यास

सीप

चंद्र सिंह बिरकाळी

नदी

इरशाद अज़ीज़

म्हारो मन्न

सत्येंद्र चारण

म्हारौ गांव

हरमन चौहान

तपत अर किसान

बिशनाराम स्वामी

संझ्या : तीन चतराम

प्रेमजी ‘प्रेम’

आसान कोनी

सुमन पड़िहार

बीज अर माटी री बंतळ

गजादान चारण ‘शक्तिसुत’

प्रणय

ओमप्रकाश गर्ग 'मधुप'

सूरज

इरशाद अज़ीज़

उजास रै आंगणै

रतन ‘राहगीर’

रचीजै सिस्टी

सन्तोष मायामोहन

तूं जामण को नरम काळज्यो

प्रेमजी ‘प्रेम’

सबद खोजू

चन्द्र प्रकाश देवल

परकत रा पसवाड़ा

गीतिका पालावात कविया

निनाण

महावीर प्रसाद जोशी

दु:खां रा मारग

इन्द्र प्रकाश श्रीमाली

रणखार

जितेन्द्र कुमार सोनी

पीळा पात

हुसैनी वोहरा

मिनख री भुंवाळी

सुमन बिस्सा

कुण सूरज री धूंणी तापै

गौरीशंकर ‘भावुक’

सज रैया है कैक्टस

किशोर कुमार निर्वाण

माटी री सौरम

इरशाद अज़ीज़

काल

नागराज शर्मा

रेत में मधुमास

इन्द्र प्रकाश श्रीमाली

किरड़कांटियो

कन्हैयालाल सेठिया

सूरज मुळकै

इरशाद अज़ीज़

स्यात यूं मुळकै

सतीश छिम्पा