सुपना पर कवितावां

सुप्तावस्था के विभिन्न

चरणों में अनैच्छिक रूप से प्रकट होने वाले दृश्य, भाव और उत्तेजना को सामूहिक रूप से स्वप्न कहा जाता है। स्वप्न के प्रति मानव में एक आदिम जिज्ञासा रही है और विभिन्न संस्कृतियों ने अपनी अवधारणाएँ विकसित की हैं। प्रस्तुत चयन में स्वप्न को विषय बनाती कविताओं को शामिल किया गया है।

कविता162

आजादी अर सपना

अर्जुनदेव चारण

काची-पाकी जूण

आशीष पुरोहित

मजूर रौ दिन

अर्जुनदेव चारण

जे म्हैं आदमी होऊँ

विमला महरिया 'मौज'

दीठ रो फरक

आरती छंगाणी

तूं

सत्य पी. गंगानगर

घर अर फळसौ

आईदान सिंह भाटी

म्हारी कविता

आईदान सिंह भाटी

म्हारा सपना

महेंद्रसिंह छायण

ओ जमारो

हरि प्रसाद पारीक

मुट्ठी भर सुपना

गौतम अरोड़ा

इणसूं किणरी हुवै नीं होड

अस्त अली खां मलकांण

सुपनां

शंभुदान मेहडू

लो, सूंपूं हूं थांनै

मीठेश निर्मोही

सुपनौ अर जथारथ

वाज़िद हसन काजी

नैड़ास

प्यारा सिंह सहराई

रठ में ठर

सत्यदीप ‘अपनत्व’

ओळख

कुमार अजय

रोज-रोज

मंगत बादल

बीज

रमेश मयंक

राड़ भोभर बणावै

राजेश कुमार व्यास

सांप-सीढ़ी रौ गत्तौ

चन्द्र प्रकाश देवल

थे

सुशीला चनानी

सांची बेटी बण जाऊॅं

मंजू किशोर 'रश्मि'

नागो पूत

कृष्ण कुमार स्वामी

अतीत

ज़ेबा रशीद

रूपक

आईदान सिंह भाटी

गीतड़ल्यौ

जबरनाथ पुरोहित

जीवण

राजेश कुमार व्यास

बदलतौ मौसम

ज़ेबा रशीद

बोलै सरणाटो

हरीश भादानी

पतंग अर टाबर

मदन सैनी

समाजवाद

भाग्य रेखा

सुपनो

सुनील कुमार लोहमरोड़ ‘सोनू’

तार-तार सपना

रचना शेखावत

बदळाव

तारासिंह

सुपनौ

जनकराज पारीक

मिलण-सिंझ्या

मेघराज मुकुल

गीतां को गेलो

प्रेमजी ‘प्रेम’

सुपना

विनोद स्वामी

अेक माड़ो सुपनो

मदन गोपाल लढ़ा

तू नईं आई

कृष्ण बृहस्पति

सुराज रै खांध

कृष्ण बिश्नोई

कचायत

पूनमचंद गोदारा

सुपनै मांय

हेमन्त शेष