सुपना पर कवितावां

सुप्तावस्था के विभिन्न

चरणों में अनैच्छिक रूप से प्रकट होने वाले दृश्य, भाव और उत्तेजना को सामूहिक रूप से स्वप्न कहा जाता है। स्वप्न के प्रति मानव में एक आदिम जिज्ञासा रही है और विभिन्न संस्कृतियों ने अपनी अवधारणाएँ विकसित की हैं। प्रस्तुत चयन में स्वप्न को विषय बनाती कविताओं को शामिल किया गया है।

कविता149

आजादी अर सपना

अर्जुनदेव चारण

काची-पाकी जूण

आशीष पुरोहित

मजूर रौ दिन

अर्जुनदेव चारण

घर अर फळसौ

आईदान सिंह भाटी

म्हारी कविता

आईदान सिंह भाटी

जे म्हैं आदमी होऊँ

विमला महरिया 'मौज'

खुली आंख रा सुपना

नरेंद्र व्यास

मन नै मारण रो उपाव

प्रिया शर्मा

काळ बहेलियो

नन्दकिशोर चतुर्वेदी

हेत

सिया चौधरी

मिनख रा चाळा

इन्द्रा व्यास

म्हैं

सुशीला चनानी

हेत रा रंग

मदन गोपाल लढ़ा

सौळह री उमर

प्रियंका भारद्वाज

छिमा

कृष्णा आचार्य

सुपनो

श्याम महर्षि

थूं आज्या नीं

कुमार अजय

काळ-दुकाळ

प्रेमजी ‘प्रेम’

हेली

ताऊ शेखावटी

म्हारो सुपनों

नरेंद्र व्यास

पांगळा भाई

गोरधन सिंह शेखावत

सपनै री सीव माथै बाड़

चन्द्र प्रकाश देवल

माथे पर चांद

प्रियंका भारद्वाज

आखतौ

मणि मधुकर

धरती रो हेलो

मेघराज मुकुल

सुपनो क साच

प्रकाशदान चारण

काळीबंगा : दोय

ऋतुप्रिया

दरद रा डूँगर

नन्दकिशोर चतुर्वेदी

खोयोड़ै समदर रा सुपना

विजयसिंह नाहटा

कविता रो मारग

गजेन्द्र कंवर चम्पावत

भायलै नै कागद

अल्फ्रेड प्रागनेल

हे! हरियाळा रूंखड़ा

कमल सिंह सुल्ताना

भरम

सत्यप्रकाश जोशी

घर

नीरज दइया

सोरी जिनगांणी

रामेश्वर दयाल श्रीमाली

प्रेम सनैव

बसन्ती पंवार

नाडी रो जळ

गजेन्द्र कंवर चम्पावत

टेम

जितेन्द्र निर्मोही

पित्तर सोवै

राजेश कुमार व्यास

सोध लीवी पिरथमी

नंद भारद्वाज

बदळाव

निशान्त

हपनं

शैलेन्द्र उपाध्याय

बुढ़ळियौ सूरज

शंभुदान मेहडू

सपना

अर्जुनदेव चारण

मूंन व्हैजा

चन्द्र प्रकाश देवल