सुपना पर कवितावां

सुप्तावस्था के विभिन्न

चरणों में अनैच्छिक रूप से प्रकट होने वाले दृश्य, भाव और उत्तेजना को सामूहिक रूप से स्वप्न कहा जाता है। स्वप्न के प्रति मानव में एक आदिम जिज्ञासा रही है और विभिन्न संस्कृतियों ने अपनी अवधारणाएँ विकसित की हैं। प्रस्तुत चयन में स्वप्न को विषय बनाती कविताओं को शामिल किया गया है।

कविता167

आजादी अर सपना

अर्जुनदेव चारण

काची-पाकी जूण

आशीष पुरोहित

मजूर रौ दिन

अर्जुनदेव चारण

घर अर फळसौ

आईदान सिंह भाटी

म्हारी कविता

आईदान सिंह भाटी

जे म्हैं आदमी होऊँ

विमला महरिया 'मौज'

दीठ रो फरक

आरती छंगाणी

तूं

सत्य पी. गंगानगर

खुली आंख रा सुपना

नरेंद्र व्यास

मन नै मारण रो उपाव

प्रिया शर्मा

काळ बहेलियो

नन्दकिशोर चतुर्वेदी

हेत

सिया चौधरी

दिव्य-दीठ

गंगादास

मिनख रा चाळा

इन्द्रा व्यास

म्हैं

सुशीला चनानी

हेत रा रंग

मदन गोपाल लढ़ा

सौळह री उमर

प्रियंका भारद्वाज

छिमा

कृष्णा आचार्य

सुपनो

श्याम महर्षि

थूं आज्या नीं

कुमार अजय

काळ-दुकाळ

प्रेमजी ‘प्रेम’

छानै-छानै

ज्ञानसिंह चौहान ‘मोरपांख’

हेली

ताऊ शेखावटी

म्हारो सुपनों

नरेंद्र व्यास

पांगळा भाई

गोरधन सिंह शेखावत

सपना

अर्जुनदेव चारण

मूंन व्हैजा

चन्द्र प्रकाश देवल

चावना

वाज़िद हसन काजी

नींद

सुरेश पारीक ‘शशिकर’

सतमासिया सपना

कृष्ण बृहस्पति

चांदणी पील्यां

रघुराजसिंह हाड़ा

मनड़ै रो मारग

कृष्णा आचार्य

दीठ

अर्जुनसिंह शेखावत

थारौ प्रीतम अळगौ हेली

अस्त अली खां मलकांण

सवाल (अेक)

गौरीशंकर निमिवाळ

ऊजळी पांखां सूं

सुमन बिस्सा

रेत मांय रळग्यो

मधु आचार्य 'आशावादी'

अन्तस उठ बोल्यो

मोहम्मद सदीक

बा

थानेश्वर शर्मा

रूपक

आईदान सिंह भाटी

गीतड़ल्यौ

जबरनाथ पुरोहित

जीवण

राजेश कुमार व्यास

बदलतौ मौसम

ज़ेबा रशीद

बोलै सरणाटो

हरीश भादानी

पतंग अर टाबर

मदन सैनी