माँ पर कवितावां

किसी कवि ने ‘माँ’ शब्द

को कोई शब्द नहीं, ‘ॐ’ समान ही एक विराट-आदिम-अलौकिक ध्वनि कहा है। प्रस्तुत चयन में उन कविताओं का संकलन किया गया है, जिनमें माँ आई है—अपनी विविध छवियों, ध्वनियों और स्थितियों के साथ।

कविता194

भूखमोचिनी

मदन गोपाल लढ़ा

मां

मीठेश निर्मोही

वो भेजै थनै

अर्जुन देव चारण

बा स्यात मां ही

देवीलाल महिया

दुख

अर्जुन देव चारण

मां ई होय सकै ही

इन्दु तोदी

मां री मैमा

निर्मला राठौड़

म्हारी मां!

किरण राजपुरोहित 'नितिला'

चानणो

अंजु कल्याणवत

सनेसो

गीता सामौर

काळकी कुत्ती

राजेन्द्र बारहठ

ऊजळौ पख

कमल रंगा

मा री पीड़

नमामीशंकर आचार्य

बाळकियौ

मणि मधुकर

डर

मनमीत सोनी

राजपूत रो डावड़ो

रावत सारस्वत

मां री कूख

देवीलाल महिया

पिताजी-3

ओम पुरोहित ‘कागद’

थप्पड़

जगदीश गिरी

थारी ओळूं रा अैनाण

सुशीला शिवराण

मा

प्रियंका भारद्वाज

जांमण

चन्द्र प्रकाश देवल

म्हारै राखूंडै

सत्यनारायण सोनी

कुण सुणै

वाज़िद हसन काजी

मा

गौरी शंकर निम्मीवाल

खुस है मा

मनमीत सोनी

राजा

भगवती प्रसाद चौधरी

सूंपै अेक दीठ

पुनीत कुमार रंगा

जूण रा इग्यारा चितराम

सुरेन्द्र सुन्दरम

रेत

विप्लव व्यास

माटी रो सीर

ओम अंकुर

धरती मा

भंवर कसाना

सिटल

कुमार श्याम

चेत गावड़ी

चेतन स्वामी

कीड़ी नगरो

पूनमचंद गोदारा

सवाल

वरदी चंद राव 'विचित्र'

कारीगरी

राजूराम बिजारणियां