मायड़ भासा पर कवितावां

मातृभाषा किसी व्यक्ति

की वह मूल भाषा होती है जो वह जन्म लेने के बाद प्रथमतः बोलता है। यह उसकी भाषाई और विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान का अंग होती है। गांधी ने मातृभाषा की तुलना माँ के दूध से करते हुए कहा था कि गाय का दूध भी माँ का दूध नहीं हो सकता। कुछ अध्ययनों में साबित हुआ है कि किसी मनुष्य के नैसर्गिक विकास में उसकी मातृभाषा में प्रदत्त शिक्षण सबसे महत्त्वपूर्ण होता है। इस चयन में मातृभाषा विषयक कविताओं को शामिल किया गया है।

कविता76

आ राजस्थानी भाषा है

शक्तिदान कविया

मायड़ भासा

किरण राजपुरोहित 'नितिला'

चेतावणी

कन्हैयालाल सेठिया

प्रवासी

चन्द्र प्रकाश देवल

आंनै कुण जाणसी

प्रकाशदान चारण

मायड़ रो ओलभौ

रामाराम चौधरी

सबदां री हद रै मांय

आईदान सिंह भाटी

सतायोड़ां री भासा

चन्द्र प्रकाश देवल

भासा रौ भरोसौ

चन्द्र प्रकाश देवल

धरती'र भासा!

कन्हैयालाल सेठिया

नेहचौ

चन्द्र प्रकाश देवल

म्हैं हांसी ही

अंकिता पुरोहित

कुण सूं पूछां..?

मंजू किशोर 'रश्मि'

अंग्रेजी बैठी कंधोळ

सत्यनारायण इन्दौरिया

छेकड़ कद?

दुलाराम सहारण

म्हारी जुबान रो गीत

हरिमोहन सारस्वत 'रूंख'

मात-भासा

विक्रमसिंह गून्दोज

कांई करां हजूर!

चन्द्र प्रकाश देवल

म्हारी मातभासा

प्रकाशदान चारण

मती घटाज्यो देस रो माँण...

रामजीवण सारस्वत ‘जीवण’

म्हारौ देस

रेवतदान चारण कल्पित

मायड़भासा रौ निवाछ

चन्द्र प्रकाश देवल

मायड़ सूं प्रीत

सुमन पड़िहार

थारौ वासौ

चन्द्र प्रकाश देवल

बेजुबान

प्रभुदयाल मोठसरा

म्हूं वागड़ी

नीता चौबीसा

भासा रो गीत

मोहन आलोक

आपरी मातृभाषा

मूळचंद प्राणेश

मोटी मरजादण मरुभाषा

गजादान चारण ‘शक्तिसुत’

मां-भासा

रामस्वरूप किसान

पडूतर

आईदान सिंह भाटी

मायड़

नीलम शर्मा ‘नीलू’

मायड़ भाषा

प्रहलाद कुमावत 'चंचल'

मायड़ भासा

श्रवण दान शून्य

आपां री भाषा

मईनुदीन कोहरी 'नाचीज'

मायड़ भासा

निशा आर्य

रजथानी भासा गजब

कमल सिंह सुल्ताना

मायड़ री मानता

शंकर दान चारण

भासा

सत्यप्रकाश जोशी

ओळूं में भासा

चन्द्र प्रकाश देवल

गा

मनोज कुमार स्वामी

मायड़ भासा मोवणी

संतोष शेखावत ‘बरड़वा’

व्हाली राजस्थानी

अनुश्री राठौड़

मानिता सारू मूंडो जौवे

दीपा परिहार 'दीप्ति'

सबद नाद

हरिमोहन सारस्वत 'रूंख'