मायड़ भासा पर गीत

मातृभाषा किसी व्यक्ति

की वह मूल भाषा होती है जो वह जन्म लेने के बाद प्रथमतः बोलता है। यह उसकी भाषाई और विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान का अंग होती है। गांधी ने मातृभाषा की तुलना माँ के दूध से करते हुए कहा था कि गाय का दूध भी माँ का दूध नहीं हो सकता। कुछ अध्ययनों में साबित हुआ है कि किसी मनुष्य के नैसर्गिक विकास में उसकी मातृभाषा में प्रदत्त शिक्षण सबसे महत्त्वपूर्ण होता है। इस चयन में मातृभाषा विषयक कविताओं को शामिल किया गया है।

गीत11

मायड़ भासा री पीड़

छैलूदान चारण 'छैल'

मूळ कठै अर डाळ कठै

कल्याणसिंह राजावत

भासा मायड़ बोलो रै!

विनोद सारस्वत

भासा गीत

उपेन्द्र अणु

राजस्थानी वाणी-गीत

ठाकुर रामसिंह

पड़दै रै भीतर

कानदान ‘कल्पित’

मायड़ भाषा

प्रेम शास्त्री

मायड़ भासा राजस्थानी

बस्तीमल सोलंकी भीम

राजस्थानी गीत

विनोद सारस्वत