सुख पर कवितावां

आनंद, अनुकूलता, प्रसन्नता,

शांति आदि की अनुभूति को सुख कहा जाता है। मनुष्य का आंतरिक और बाह्य संसार उसके सुख-दुख का निमित्त बनता है। प्रत्येक मनुष्य अपने अंदर सुख की नैसर्गिक कामना करता है और दुख और पीड़ा से मुक्ति चाहता है। बुद्ध ने दुख को सत्य और सुख को आभास या प्रतीति भर कहा था। इस चयन में सुख को विषय बनाती कविताओं का संकलन किया गया है।

कविता159

म्हारे गांव रा लोग

भगवती लाल व्यास

बीज नै उगणो पड़सी

भीम पांडिया

धोरै री ढाळ माथै भासा

आईदान सिंह भाटी

सुख-दुख

अंजु कल्याणवत

दीठ रो फरक

आरती छंगाणी

इण तरै रा सून्याड़ में

भगवती लाल व्यास

अंतै धैजो धार

महेंद्रसिंह छायण

घर

प्रवीण सुथार

इन्द्रधनूस

सुधा सारस्वत

तपती धरती

जगदीशसिंह सीसोदिया ‘स्नेही’

फागणियो आयौ

शकुंतला अग्रवाल 'शकुन'

इतरावणजोग

तेजस मुंगेरिया

खुसी

सीमा भाटी

धन-धन-राजस्थान

कान्हा शर्मा

लिछमी-लाडली

संग्राम सिंह सोढा

दिवाळी

लीला मोदी

छळिया

मंजू किशोर 'रश्मि'

खुस है मा

मनमीत सोनी

जाळ जठै जसनाथ

लोक परंपरा

आशावाद

नाजिम हिकमत

रुत अर मिनख रो पळटाव

सत्येंद्र चारण

थारै नांव

रवि पुरोहित

बिरखा आई रे

श्यामसुन्दर ‘श्रीपत’

दड़ी घोटा

मोहन मण्डेला

आपणौ घर

कृष्णा कुमारी ‘कमसिन’

दस दूहा : आंख माथै

कुंदन सिंह 'सजल'

मन घणो हलकावै रे

किरण बाला 'किरन'

परेम का गीत

कृष्णा कुमारी ‘कमसिन’

जीत रौ दिन

सुयुन बाई एरालीयेव

हेलो

अशोक परिहार 'उदय'

बरसाळौ

तेजस मुंगेरिया

सावचेत जे रहतौ

अस्त अली खां मलकांण

प्रीत री जेवड़ी

कृष्णा जाखड़

हे! हरियाळा रूंखड़ा

कमल सिंह सुल्ताना

माछळी

अम्बिका दत्त

ढिगळी होवण तांई

ओम पुरोहित ‘कागद’

नुसखौ

चन्द्र प्रकाश देवल

चिंता नीं करणी

नगेन्द्र नारायण किराडू

थारी आफळ

नंद भारद्वाज

चौमासु (सौमासु)

कैलाश गिरि गोस्वामी

लूण

अम्बिका दत्त

भींत

हरीश हैरी

दिव्य-दीठ

गंगादास