सुख पर कवितावां

आनंद, अनुकूलता, प्रसन्नता,

शांति आदि की अनुभूति को सुख कहा जाता है। मनुष्य का आंतरिक और बाह्य संसार उसके सुख-दुख का निमित्त बनता है। प्रत्येक मनुष्य अपने अंदर सुख की नैसर्गिक कामना करता है और दुख और पीड़ा से मुक्ति चाहता है। बुद्ध ने दुख को सत्य और सुख को आभास या प्रतीति भर कहा था। इस चयन में सुख को विषय बनाती कविताओं का संकलन किया गया है।

कविता131

धोरै री ढाळ माथै भासा

आईदान सिंह भाटी

इण तरै रा सून्याड़ में

भगवती लाल व्यास

सुख-दुख

अंजु कल्याणवत

घर

प्रवीण सुथार

अंतै धैजो धार

महेंद्रसिंह छायण

इन्द्रधनूस

सुधा सारस्वत

बीज नै उगणो पड़सी

भीम पांडिया

अबकै

सांवर थावर

जमानो

निशान्त

कम्पोज

वासुदेव चतुर्वेदी

किणनै उडीकां हां

अर्जुनदेव चारण

लेनिन पोथी

विताली कोरोतिच

खुसी रा गीत

किशोर कुमार निर्वाण

पांणत

रेवतदान चारण कल्पित

मिनख अर कीड़ी

श्याम सुन्दर टेलर

दीठ रो फरक

आरती छंगाणी

गरीब री पीड़

जेठानंद पंवार

खुसी रो काळ

निशान्त

अगवाणी नूंया साल की

रामदयाल मेहरा

अळगोजा

सोनी सांवरमल

होळी

रंजना गोस्वामी

दीप सिखा कैवै है

रतनलाल दाधीच

म्हारो गाँव

रामनिवास सोनी

अे दिवलै री जोत

किशोर कल्पनाकान्त

कोसिस

इन्द्र प्रकाश श्रीमाली

पतियारो

मदन गोपाल लढ़ा

बिरखा

सुमेरसिंह शेखावत

पीपळी

गौरीशंकर निमिवाळ

थारै होवण नै

पवन राजपुरोहित

चिड़कली

अशोक परिहार 'उदय'

घाव-सुख

पारस अरोड़ा

काळ अर भूख

भगवती लाल व्यास

पीठ पर धूप

मेघराज मुकुल

बरसाळो

मघाराम लिम्बा

हरख

शैलेन्द्र उपाध्याय

मोरचंग

प्रमिला शंकर

फागणियो आयौ

शकुंतला अग्रवाल 'शकुन'

इतरावणजोग

तेजस मुंगेरिया

खुसी

सीमा भाटी

धन-धन-राजस्थान

कान्हा शर्मा

छळिया

मंजू किशोर 'रश्मि'

खुस है मा

मनमीत सोनी

जाळ जठै जसनाथ

लोक परंपरा