धरती पर कवितावां

पृथ्वी, दुनिया, जगत।

हमारे रहने की जगह। यह भी कह सकते हैं कि यह है हमारे अस्तित्व का गोल चबूतरा! प्रस्तुत चयन में पृथ्वी को कविता-प्रसंग में उतारती अभिव्यक्तियों का संकलन किया गया है।

कविता150

माटी थनै बोलणौ पड़सी

रेवतदान चारण कल्पित

धरती काती प्रीत

राजूराम बिजारणियां

आभै उतरी प्रीत

राजूराम बिजारणियां

भटकाव

मदन सैनी

म्हारौ राजस्थान

रामाराम चौधरी

झूठ री जड़

गजेसिंह राजपुरोहित

धरती'र भासा!

कन्हैयालाल सेठिया

काळ

कन्हैयालाल सेठिया

कीं नान्ही कवितावां (क्षणिका)

घनश्याम नाथ कच्छावा

इण भांत राखी थूं

मालचंद तिवाड़ी

म्हारो सुपनों

नरेंद्र व्यास

सवाल

मदन गोपाल लढ़ा

म्हारा पिताजी

गौरीशंकर निमिवाळ

सोध लीवी पिरथमी

नंद भारद्वाज

जूंनौ तरवर

रेवतदान चारण कल्पित

माटी रा रंगरेज

रेवतदान चारण कल्पित

अगनी मंतर

भगवती लाल व्यास

रेत

प्रेमलता सोनी

इळा री गळाई

चन्द्र प्रकाश देवल

धरती रो करज

कृष्णा सिन्हा

धरती मा

भंवर कसाना

धरती रो धणी

दूदसिंह काठात

किण नै दोस देवां

पुरुषोत्तम छंगाणी

मोट्यार मौसम

प्रेमजी ‘प्रेम’

फगत दरखत

भंवरसिंह सामौर

ताणियोड़ी भरत माथै

मीठेश निर्मोही

बता बेकळू

ओम पुरोहित ‘कागद’

थारै हुवण री

सांवर दइया

धुंवाड़ौ

उपेन्द्र अणु

बीं सागण भौम

मदन गोपाल लढ़ा

धरती री मुळक

रमेश मयंक

करसाणी म्हारा गांव री

फतहलाल गुर्जर 'अनोखा'

जागो और जगाओ

कल्याणसिंह राजावत

थळवट रौ उमराव

सुमन बिस्सा

चतराम

जितेन्द्र निर्मोही

गा

मनोज कुमार स्वामी

पृथ्वी

मालचंद तिवाड़ी

धरती रो काया कलप

सत्येन जोशी

आसान कोनी

सुमन पड़िहार

प्रणय

ओमप्रकाश गर्ग 'मधुप'

हिलमिल चालो

त्रिलोक शर्मा

बै अर आपां

निशान्त

चावना

वाज़िद हसन काजी