धरती पर कवितावां

पृथ्वी, दुनिया, जगत।

हमारे रहने की जगह। यह भी कह सकते हैं कि यह है हमारे अस्तित्व का गोल चबूतरा! प्रस्तुत चयन में पृथ्वी को कविता-प्रसंग में उतारती अभिव्यक्तियों का संकलन किया गया है।

कविता176

माटी थनै बोलणौ पड़सी

रेवतदान चारण कल्पित

धरती काती प्रीत

राजूराम बिजारणियां

आभै उतरी प्रीत

राजूराम बिजारणियां

धरती'र भासा!

कन्हैयालाल सेठिया

झूठ री जड़

गजेसिंह राजपुरोहित

भटकाव

मदन सैनी

सौरम रो भभको

रामस्वरूप किसान

म्हारौ राजस्थान

रामाराम चौधरी

काळ

कन्हैयालाल सेठिया

धरती मा

भंवर कसाना

धरती रो धणी

दूदसिंह काठात

वंदण

रसूल हमजातोव

किण नै दोस देवां

पुरुषोत्तम छंगाणी

मोट्यार मौसम

प्रेमजी ‘प्रेम’

फगत दरखत

भंवरसिंह सामौर

ताणियोड़ी भरत माथै

मीठेश निर्मोही

बता बेकळू

ओम पुरोहित ‘कागद’

थारै हुवण री

सांवर दइया

सदै सांवठा जीवन पोखै

सत्यनारायण इन्दौरिया

धुंवाड़ौ

उपेन्द्र अणु

बीं सागण भौम

मदन गोपाल लढ़ा

धरती री मुळक

रमेश मयंक

करसाणी म्हारा गांव री

फतहलाल गुर्जर 'अनोखा'

जागो और जगाओ

कल्याणसिंह राजावत

थळवट रौ उमराव

सुमन बिस्सा

बीज

ओम नागर

चतराम

जितेन्द्र निर्मोही

गा

मनोज कुमार स्वामी

पृथ्वी

मालचंद तिवाड़ी

धरती रो काया कलप

सत्येन जोशी

पूजा जोग

राधेश्याम 'अटल'

वा भटकै है

चंद्रशेखर अरोड़ा

रूँख

चतुर कोठारी

माटी सूं जोड़तौ

विमला महरिया 'मौज'

नित नुंवो सिणगार

राधेश्याम 'अटल'

रगत पीयोड़ी रज

धनंजया अमरावत

म्हारी धरती

रेवतदान चारण कल्पित

धणी

चेतन स्वामी

कोनी बदळियो

दिनेश चारण

चन्द्र संदेश

नृसिंह राजपुरोहित

मन री लकीरां

बाबूलाल शर्मा

मत पीटै नित ढोल

सीताराम महर्षि

मिनखां री बातां

बी. एल. माली ‘अशान्त’

कीड़ी

अशोक परिहार 'उदय'

जमी सूं जुड़ाव

राजेशदुलारी सान्दू