धरती पर कवितावां

पृथ्वी, दुनिया, जगत।

हमारे रहने की जगह। यह भी कह सकते हैं कि यह है हमारे अस्तित्व का गोल चबूतरा! प्रस्तुत चयन में पृथ्वी को कविता-प्रसंग में उतारती अभिव्यक्तियों का संकलन किया गया है।

कविता164

धरती काती प्रीत

राजूराम बिजारणियां

आभै उतरी प्रीत

राजूराम बिजारणियां

माटी थनै बोलणौ पड़सी

रेवतदान चारण कल्पित

काळ

कन्हैयालाल सेठिया

सौरम रो भभको

रामस्वरूप किसान

म्हारौ राजस्थान

रामाराम चौधरी

भटकाव

मदन सैनी

झूठ री जड़

गजेसिंह राजपुरोहित

धरती'र भासा!

कन्हैयालाल सेठिया

आ रूसी धूड़

अन्ना अख्मातोवा

पराई भोम

गोरधन सिंह शेखावत

मारग री हूंस

चन्द्र प्रकाश देवल

अे दुनियां आधी

संजय पुरोहित

स्यात यूं मुळकै

सतीश छिम्पा

आस

सुमन पड़िहार

धरती रो पग भारी

त्रिलोक गोयल

धरती का दो पग

गोविन्द हाँकला

ओळमो-जड़ आंधै नै?

अन्नाराम ‘सुदामा'

जीबो

गौरीशंकर 'कमलेश'

हथियार अर थारी कूंख

अर्जुनदेव चारण

जतन

ओमप्रकाश गर्ग 'मधुप'

इण धरती रै ऊजळ आंगण

महेंद्रसिंह छायण

सरंग फाट जावैला

ब्रजमोहन सपूत

धरती नो धणी

जगमालसिंह सिसोदिया

मारग री मौत

चन्द्र प्रकाश देवल

सपनो

गोरधन सिंह शेखावत

माँ री हथेळी पर

संदीप 'निर्भय'

जड़

ओम अंकुर

तिरस सागै जीवणो

रेणुका व्यास 'नीलम'

जातरा

प्रेमजी ‘प्रेम’

बीत्यै जुग री बात

हरीश भादानी

तिणकलो

निशान्त

मजूर

प्रियंका भारद्वाज

देव करै धरती रखवाळी

अस्त अली खां मलकांण

पैलड़ी जीत

ओमप्रकाश गर्ग 'मधुप'

बीज

चंद्र सिंह बिरकाळी

जळ फकत जळ नीं है : सबद

बी. एल. माली ‘अशान्त’

धरती री भासा

मोहन आलोक

ओढ्यां तारां छाई रात

मालचंद तिवाड़ी

सरणार्थी कैंप

प्रियंका भारद्वाज

माटी

रचना शेखावत

भींतां रा मांडणा

श्याम सुन्दर टेलर

निसतारौ

चन्द्र प्रकाश देवल

खेत री बां जमीन

गौरीशंकर निमिवाळ