धरती पर ग़ज़ल

पृथ्वी, दुनिया, जगत।

हमारे रहने की जगह। यह भी कह सकते हैं कि यह है हमारे अस्तित्व का गोल चबूतरा! प्रस्तुत चयन में पृथ्वी को कविता-प्रसंग में उतारती अभिव्यक्तियों का संकलन किया गया है।

ग़ज़ल8

आभै साम्हीं भाळ भायला

अब्दुल समद ‘राही’

राखोड़ो व्हे जाई जी

पुष्कर 'गुप्तेश्वर'

मत बांट साथी

बस्तीमल सोलंकी भीम

थां सूं लूंठी आस धणी!

राजेंद्र स्वर्णकार

अंतस तणी

रतन सिंह चांपावत