धरती पर गीत

पृथ्वी, दुनिया, जगत।

हमारे रहने की जगह। यह भी कह सकते हैं कि यह है हमारे अस्तित्व का गोल चबूतरा! प्रस्तुत चयन में पृथ्वी को कविता-प्रसंग में उतारती अभिव्यक्तियों का संकलन किया गया है।

गीत24

धरती धोरां री

कन्हैयालाल सेठिया

माटी रौ हेलौ

रेवतदान चारण कल्पित

धरती रो हियो जगादे

मेघराज मुकुल

म्हारौ राजस्थान जी

कालूराम प्रजापति 'कमल'

बरस बादळा, यार भायला!

रामकरण प्रभाती

सूरज सींया मरग्यो

विश्वामित्र दाधीच

पियै नै पतरी

भीम पांडिया

धरती रो सिणगार

मेघराज मुकुल

घुळ-घुळ बैवै रूप रळी

कल्याणसिंह राजावत

सात जुगां रौ लेखौ

रेवतदान चारण कल्पित

बन मोरिया रे

कृष्ण बिहारी ‘भारतीय’

कबूतराँ को जोड़ो

रघुराजसिंह हाड़ा

हाथ बढा तू मानवी

जयकृष्ण शर्मा

लुळ-लुळ करो सलाम

मोहम्मद सदीक

जाणां छां

ब्रजमोहन सपूत

आयो इंगरेज मुलक रै ऊपर

बांकीदास आशिया

पर्यावरण संरक्षण

ओमप्रकाश सरगरा 'अंकुर'

दाग्याँ जा

प्रेम शास्त्री

जाग्यो राजस्थान

मोहन मण्डेला