जूण पर लेख
एक लम्बे समय से लोक-गीत एवं लोक-संगीत पर कार्य करते रहने का अवसर मिला। सन् 1953 की बात है जब पहली बार लोक-गीतों के विषय में सोचने का अनायास क्रम प्रारम्भ हुआ। बिज्जी एवं मैं 'प्रेरणा' नाम से एक हिन्दी साहित्य की मासिक पत्रिका का सम्पादन कर रहे थे।
माणक रै जून 1982 रै अंक में कवि सम्मेलनां री यादां बाबत राजस्थानी कवियां रा कीं सस्मरण छप्पा हा। बीं री आगली कड़ी में मायड़ भाषा रा जूना अर जाणीता कवि रेवतदानजी चारण, गणपतचदजी भंडारी अर लक्ष्मणसिंघजी रसवंत आपरा खाटा-मीठा अनुभव ‘माणक’ रा पाठकां सांमी
आई. अे. अेस री ट्रेनिंग रै बाद पैली पोस्टिंग अेस.डी.अेम. माउंट आबू रै रूप मांय मिली। पैली पोस्टिंग अर बा ई राजस्थान रै सुरग मांय, जठै माउंट आबू तो टूरिस्टां सूं भरयो रैवतो, पण आबू रोड (तहसील आबू रोड मांय है अर अेस.डी.अेम माउंट आबू) तो टूरिस्टां सूं भरयौ