विडरूपता पर ग़ज़ल

सामाजिक जीवण में आपां

रै असवाड़ै-पसवाड़ै अेड़ी केई विसमतावां हुवै जिणा सूं मिनख रौ जीवणौ, न जीवणै जेड़ौ हो ज्यावै। अठै संकलित रचनावां ई विसै सूं ई जुड़ियोड़ी है।

ग़ज़ल27

कुण जाणैं आ कसी भाळ है

हरफूलसिंह ‘रसिक’

पिता जैड़ा पूत आज रा

आईदान सिंह भाटी

देखो तो म्हारै देस में आवै समाजवाद

रामेश्वर दयाल श्रीमाली

जो दिया करै सदा खुला हाथ सूं

आर. सी. शर्मा ‘गोपाल’

झेलै सूरज री लाय

विनोद सोमानी 'हंस'

न हो तिल बी जघां भी झाड़

भागीरथसिंह भाग्य

सरकार का देखले मिजाज भायला

प्रदीप शर्मा ‘दीप’

भौत निभी, अब भी निभरी

हरफूलसिंह ‘रसिक’

थारी म्हारी का भूंजा क्यूं लादणा

शांति भारद्वाज 'राकेश'

यो सलाम बी घाटा को

शांति भारद्वाज 'राकेश'

ठग रैया लोग

शिवराज छंगाणी

तिणकलै री ई जो इतरी छिंयां है

रामेश्वर दयाल श्रीमाली

मरनौ तो अटल है भाया

अब्दुल समद ‘राही’

कन्या हुयां धरम भी होसी

बिहारी शरण पारीक

मिनख तो दीखै कठै अब

शिवराज छंगाणी

बूरो मत ना मान जो

अरविन्द चूरुवी

निरभै गोधा खेत चरै छै

शंकरलाल स्वामी