अपणायत पर ग़ज़ल

मिनखीचारै सबद रै ओळै-दोळै

रौ ओ सबद आपरै मांयां एक आत्मिक रिस्तौ ले'न चालै जिणनै आपणौ लोक 'अपणायत'कैवै। अठै संकलित रचनावां अपणायत सूं जुड़ियोड़ी है।

ग़ज़ल18

बूरो मत ना मान जो

अरविन्द चूरुवी

तकदीरां री बातां अै

अशोक जोशी ‘क्रांत’

धन रा लोभी बात बदळ दी,

श्रवण दान शून्य

चंदणिया खसबू

मालचन्द्र ‘कमल’

मत चिलकावै ठाठ भायला

जयकुमार ‘रुसवा’

मरुवो

सत्य पी. गंगानगर

थाळी-थाळी निपटगी खीर

अशोक जोशी ‘क्रांत’

मोहबत री बातां, मत कर

कुंदन सिंह 'सजल'

बचता रीज्यो

प्रेमजी ‘प्रेम’