समाज पर ग़ज़ल

औमतौर सूं किणी संगठित

समूह नै समाज केय दियौ जावै पण उणरौ विमर्श लांबौ अनै महताऊ है। अठै संकलित रचनावां समाज सबद रै औळै-दौळै रचियोड़ी है।

ग़ज़ल4

मिलै नीं अठै सुखड़ो राम

लक्ष्मीनारायण रंगा

थारी म्हारी का भूंजा क्यूं लादणा

शांति भारद्वाज 'राकेश'

आदमी

राधेश्याम मेवाड़ी