समाज पर कवितावां

औमतौर सूं किणी संगठित

समूह नै समाज केय दियौ जावै पण उणरौ विमर्श लांबौ अनै महताऊ है। अठै संकलित रचनावां समाज सबद रै औळै-दौळै रचियोड़ी है।

कविता119

काळ

मणि मधुकर

अणहद नाद

भगवती लाल व्यास

म्हूँ जनता हूँ

भगवती लाल व्यास

शमसाँण री कणेर

भगवती लाल व्यास

बंटवारो

भगवती लाल व्यास

सातवौं फेरौ

अर्जुनदेव चारण

घर कठै है

अर्जुनदेव चारण

थूं कद जीवती ही मां

अर्जुनदेव चारण

आग री ओळख

पारस अरोड़ा

चौपड़-पासा

मणि मधुकर

थारी काया

अर्जुनदेव चारण

पद्मणी

अर्जुनदेव चारण

अेक बात

गोविन्द हाँकला

नफरत

भगवती लाल व्यास

आंकड़ा का फूल

प्रेमजी ‘प्रेम’

इमरत अर जैर

प्रकाशदान चारण

म्हैं

मोहन आलोक

साख राणी उमादे री

सत्यप्रकाश जोशी

ओळखाण

गोविन्द हाँकला

परमेसर

प्रेमजी ‘प्रेम’

जूंझार

गोरधन सिंह शेखावत

लाचारी

मणि मधुकर

एक च्यूंठी तावड़ी

रामस्वरूप ‘परेश’

रामपाळयो

गोविन्द हाँकला

गुवाड़ रो जायो

मोहम्मद सदीक

हूंणी

मणि मधुकर

अेलांन

मणि मधुकर

सती

अर्जुनदेव चारण

वेस्या

सतीश छिम्पा

ओ रोळ राज रो डंडो...

विनोद सारस्वत

जद तूटै अंबर सूं तारौ

रेवतदान चारण कल्पित

आभै रै अधबीच

प्रकाशदान चारण

अन्तस उठ बोल्यो

मोहम्मद सदीक

आपणी लेखणी सूं

विमला भंडारी

बोल भारमली

सत्यप्रकाश जोशी

आँच ही आँच

मोहम्मद सदीक

जुद्ध

गोरधन सिंह शेखावत

साधू

त्रिभुवन

उमादे

अर्जुनदेव चारण

जथारथ री छिब

चन्द्र प्रकाश देवल

ओळाव

सांवर दइया

नींद अर बातां

अर्जुनदेव चारण

सफदर हासमी री मौत

गोरधन सिंह शेखावत

आगै अंधारौ

नंद भारद्वाज

सुवाद

मणि मधुकर

घुड़दौड़

गोरधन सिंह शेखावत

थै जाणो हो

सांवर दइया