समाज पर कवितावां

औमतौर सूं किणी संगठित

समूह नै समाज केय दियौ जावै पण उणरौ विमर्श लांबौ अनै महताऊ है। अठै संकलित रचनावां समाज सबद रै औळै-दौळै रचियोड़ी है।

कविता178

काळ

मणि मधुकर

सबद कोस

अर्जुनदेव चारण

शमसाँण री कणेर

भगवती लाल व्यास

सातवौं फेरौ

अर्जुनदेव चारण

घर कठै है

अर्जुनदेव चारण

बंटवारो

भगवती लाल व्यास

अणहद नाद

भगवती लाल व्यास

थूं कद जीवती ही मां

अर्जुनदेव चारण

म्हूँ जनता हूँ

भगवती लाल व्यास

अणूती रीत

ज्ञानसिंह चौहान ‘मोरपांख’

दूजौ घर

प्रमिला शंकर

उडीक

पारस अरोड़ा

रुखाळो

रतन ‘राहगीर’

कुण सुणै?

दीनदयाल ओझा

नेतो

रामनिवास सोनी

गांव

गोरधन सिंह शेखावत

इण धरती पै

रतन ‘राहगीर’

भविस

मणि मधुकर

दुसासण

मणि मधुकर

सीता

अर्जुनदेव चारण

लारलै बरस

श्याम महर्षि

पावणो-समाजवाद

दूदसिंह काठात

भासा रो गीत

मोहन आलोक

अरज

रामेश्वर दयाल श्रीमाली

प्यार रौ सनैसो

विनोद सोमानी 'हंस'

ज़िन्दगी

भगवती लाल व्यास

नींद अर बातां

अर्जुनदेव चारण

आतंक रो दरद

हरदान हर्ष

बो

श्याम महर्षि

सफदर हासमी री मौत

गोरधन सिंह शेखावत

आगै अंधारौ

नंद भारद्वाज

मां रौ नांव

महेश मोड़जी

सुवाद

मणि मधुकर

घुड़दौड़

गोरधन सिंह शेखावत

जुझारू रो सवाल

रतन ‘राहगीर’

थै जाणो हो

सांवर दइया

थूं कांई कैवैलौ?

जोसेफ सीमोन कॉटर जूनियर

म्हैं नीं हारी

चंद्रशेखर अरोड़ा

सिड़िज्योड़ा होठ

कृष्ण बिश्नोई

सांस्कृतिक चेतना

श्याम महर्षि

के नांव द्यूं?

रामस्वरूप ‘परेश’

बाकी हिसाब

पारस अरोड़ा

झूठौ बणज

प्रेमजी ‘प्रेम’

आखड़ी

अर्जुनदेव चारण

म्हूँ अछूत

मुकुट मणिराज

बाड़ अर गुलाब

गोरधन सिंह शेखावत

ब्रितांत

मणि मधुकर

देस

मोहन आलोक