सिणगार पर चौपाई

लोक में सिणगार रौ घणकरौ

अरथ गैंणा-गांठा सूं लेईजै पण जद बात कविता री आवै तद उठै एक रस आय'न ऊभौ व्है जावै, जिणनै 'सिणगार रस'कैवै। अठै संकलित कवितावां सिणगार रै अनेकू पखां में जुड़योड़ी है।

चौपाई8

चिहुं दिसि चलकइ कुंडळ नूर

कवि केशव 'कीर्तिवर्धन'

दंत-पंति दीपइ ऊजळी

कवि केशव 'कीर्तिवर्धन'

मयमत्ती उनमत गज गेलि

कवि केशव 'कीर्तिवर्धन'

उरबर जोवन राजइ आप

कवि केशव 'कीर्तिवर्धन'

फूल तूल मखतूल अमूल

कवि केशव 'कीर्तिवर्धन'

दीठी अपछर नइं अणुहार

कवि केशव 'कीर्तिवर्धन'