सिणगार पर संवैया

लोक में सिणगार रौ घणकरौ

अरथ गैंणा-गांठा सूं लेईजै पण जद बात कविता री आवै तद उठै एक रस आय'न ऊभौ व्है जावै, जिणनै 'सिणगार रस'कैवै। अठै संकलित कवितावां सिणगार रै अनेकू पखां में जुड़योड़ी है।

संवैया छंद7

आज लसै ब्रजनारी सबै

बुद्धसिंह हाड़ा

शब्दालंकार सवैया

स्वामी ब्रह्मानंद

स्यांम-सरीर लसै पट पीत

बुद्धसिंह हाड़ा

अंजन मंजन कैं दृग-रंजन

बुद्धसिंह हाड़ा