लोक पर बंतळ
सबदकोसां में लोक रौ
अरथ घणै अरथां में लेईज्यौ है। कठैई इणरौ अरथ 'प्रजा' मानीज्यौ है तो कठैई 'मानखै' रै अरथ में इणनै लीरीज्यौ है। अठै प्रस्तुत रचनावां लोक सबद रै आखती-पाखती रचियोड़ी है।
अरथ घणै अरथां में लेईज्यौ है। कठैई इणरौ अरथ 'प्रजा' मानीज्यौ है तो कठैई 'मानखै' रै अरथ में इणनै लीरीज्यौ है। अठै प्रस्तुत रचनावां लोक सबद रै आखती-पाखती रचियोड़ी है।
अलेखूं फिल्मां रा निरत-निरदेसक अर नरतक प्रवीण कुमार मूल रूप सूं राजस्थान रै कांकरोली रा रैवासी। भट्यै-भट्यै, गठीलै अर स्वस्थ सरीर रा मालिक प्रवीण कुमार केई फिलमां में सह-अभिनेता रै रूप में काम कर्यों। हाल ई आप कसनै मैणत करै। आप में अहम अर बणावटीपणो
खुद री धरती रौ संगीत सै सूं मीठौ हुया करै राजस्थान री धरती रा जाया जनम्या रफीक सागर लारलै कीं बगत सूं हिन्दी फिलम जगत में अेक संगीतकार रै रूप में अपणै आप नै थापित करण सारू संघर्ष कर रैया है। फिलम-इंडस्ट्री में तो सगळा ई आपरै नांव सूं वाकब है। नवी प्रतिभावां
राधाकिशन चांदवाणी : सबसूं पैला ‘माणक’ रै पाठकां नै आपरौ कीं परिचय दिरावौ? हरीश भादाणी : म्हारौ जनम बीकानेर में ब्राह्मण (भादाणी) परिवार में होयौ। अर म्हारी शिक्षा ई बीकानेर में हुई। सरूपोत री शिक्षा पूरी नीं कर सक्यौ। इणरौ कारण म्हारी घरू परिस्थितियां
राजस्थानी, राजस्थानी नै चांस नीं देवै सुरेस राजवंसी, अेक अैड़ौ नांव, जिकौ के लारलै पंदरै बरसां सूं हिन्दी फिलम-जगत में गायक रै रूप में स्थापित होवण सारू संघरससीळ है। स. मोहम्मद रफी नै गुरू अर आदरस मांन’र वां रै ई लहजै, तरीकै अर हूबहू आवाज में गावण
म्हारौ जलम 15 अप्रैल रै दिन जयपुर शहर में हुयौ। वठै री सरजमीं रै माथै ई म्हैं होस संभाळ्यौ। बठै गोडाळियां चालणौ सीख्यौ, अर बठै ई मां-पा-बा इत्याद सबद कैवणौ सीख्यौ। बठै ई पढ-लिख’र परवांन चढ्यौ। रथखांनै रै नजदीक हवाम्हैल रै सामनै री स्कूल में अंग्रेजी
मांड म्हनै घणी पसंद है चन्द्राणी मुखर्जी गीत-संगीत—खासकर फिलमी संगीत री दुनियां रौ अेक सैंधौ-मैंधौ नांव है। ‘ओ रे सजनवा क्या होती है’ गीत सूं खुद री पिछांण बणावण आळी अर ‘मेरे मेहबूब शायद आज कुछ नाराज हैं मुझसे’ गीत सूं प्रसिद्धि अर लोकप्रियता रै
मायड़ भाषा जन जन री मूळ अस्मिता हुवै यादवेन्द्र शर्मा ‘चन्द्र’ राजस्थानी अर हिंदी रा चावा लिखारा। हिंदी में आपरी केई पोथ्यां छप्योड़ी। राजस्थानी में ‘हूं गोरी किण पीव री’, ‘जोग-संजोग’, ‘चांदा सेठाणी’ उपन्यास अर ‘ताश रौ घर’ नाटक छप्या थका। चन्द्रजी