सरणाटो!
च्यारूं-मेर
स्यां..ऽऽ स्यां..ऽऽ
सरणाटो।
चौतरफी अंधारो, ऊपर सूं
जाणै के? उतर्यो हो
होळैसी
चौफेरी
बो कांईं पसर्यो हो?
लावो-सो
चौतरफी स्यां..ऽऽ स्यां..ऽऽ
सरणाटो।
मांयनै धुक-धुकी
रुंवाळी कांपै ही
कानड़ा खड़्या दोऊं
आंख्यां कीं जोवै ही।
अळगै ऊंचै भाखरियै
रचना कांईं हुवै ही?
जाणै कुण?
अंधारो च्यारूं-मेर
सरणाटो!
न्हाटग्यो अेक दिन
अचाणचक अंधारो
पूंछ लूका गाळा में जाय लुक्यो
सरणाटो,
अंधारो।
हरख सूं
नाच उठ्या
पंछी सैंग–
डाळ्यां पै,
चिड़कल्यां गावै ही
ऊंची बैठ आळा में।
हरख रा हबोळा
लागै हा चौफेरी
राजी हो रोम-रोम
पण हुयो ओ कांई?
रोटी!
ऊंचै आभै में, दौड़ती क्यूं जावै है?
भूख रा सा बादळिया
घुरताई आवै है
जोकां सैंग जुटगी
ठा नीं के हुयो?
जेब रो छेकलो
बधतोई जा रैयो,
आंतड़ियां रोवै है
अळगै ऊंचै भाखरियै
नित नवो कीं हुवै है।