पैलां-पहल
समाज री रूढि सूं
बंटियोड़ी रस्सी में
म्हने कस’र बांध्यो
थे उणने फेर-फेर
सात फेरा रा बन्धन ज्यूं
पूरी सगती-सामरथ सूं
मजबूत करती
कसावट में साध्यो
जाणे
आथमता सूरज रै समै
भंवरा ने कमळ रो फूल
समेट लेवे आपणा आगोस में
घणो अटपटो हो
घणो उबाऊ हो
फूल-फूल रो रस लेवणियां
भंवरा रो अस्यान उळझणो
एक तो खूंटो बंधणो
घाणी रा बळद जूण जीवणो
एक ही दिशा में चालणो
अजीब-सी कसमसाहट
लीलबा लागी आहत आजादी ने
पण
थारा मोह री गंध में
मदहोश मन ने
प्रीत रा जाळ में
उळझता तन ने रास आयग्यो
पिंजर पंछी
थारों बणायो घौसळो
बसग्यो मोवणो संसार
धरती पे उतर आयो
थारो-म्हारो प्यार
टेमो-टेम
खाणो-दाणो-खेलणो
पांखी कई चावै
आनन्द रो असल रूप तो
अस्यान्
धीरे-धीरे सामै आवै
जद
न्हाना-न्हाना फूलां सूं
महकग्यो
छोटी-सी बगिया रो आंगणो
कुहक उठी फुलवारी
ममता री महक सूं
नाच उठी
तन-खेत री क्यारी
तो चिड़ा-चिड़ी री चहक
कसूम्बल कळियां री
किलकारी सूं
चहकतो संसार घणो दाय आयो
आज थूं न्ह है
इण आंगण री सिरजणहार
चिड़ा-चिड़कल्यां बड़ा होय’र
उड़ग्या
आपणा-आपणा आकास में
कसूम्बल फूल बणग्या फळ
फैलग्या संसार में
आज
आपणी मोहक यादां छोड़’र
म्हूँ आजाद हूँ
पण
पांख कटियोड़ा
होंठ सिलयोड़ा
तो
असी आजादी किण काम री
इण री आहत कामना
कांई देय सके?
सिवाय
भरम अर भटकाव रे
एकस फेरूं जागै
उण परकत इच्छावां री ओळ्यूं
ज्यामें बंधग्यो हो
म्हारो मोहक संसार।