संसार पर ग़ज़ल

‘संसरति इति संसारः’—अर्थात

जो लगातार गतिशील है, वही संसार है। भारतीय चिंतनधारा में जीव, जगत और ब्रहम पर पर्याप्त विचार किया गया है। संसार का सामान्य अर्थ विश्व, इहलोक, जीवन का जंजाल, गृहस्थी, घर-संसार, दृश्य जगत आदि है। इस चयन में संसार और इसकी इहलीलाओं को विषय बनाती कविताओं का संकलन किया गया है।

ग़ज़ल6

दया ऊंकी बणी है तो

बुद्धिप्रकाश पारीक

बोल थारो काई हाल छै

हेमन्त गुप्ता पंकज

देख तो कतनी अंधारी रात है

हेमन्त गुप्ता पंकज

थां सूं लूंठी आस धणी!

राजेंद्र स्वर्णकार

कपट कळदार घणा

लालदास 'राकेश'