पंडित जी!

क्यूं ओढ़ी रामनामी

जद थे केवौ हो

राम कण-कण में व्यापी है।

मुल्ला जी!

क्यूं बांग देवौ परभात पेल्यां

जद थे जाणौ हौ

खुदा रोम-रोम वासी है।

पण, लागै कै

थांनै भी विस्वास कोनी

अर थे लोगां नै उपदेस देवता फिरो हौ

धरम री मीमांसा करौ हौ।

समाज रा मानीतां!

क्यूं थें

मिनखां रै दरम्यान दायरौ बणावौ हो

अेकता नै खंडित करौ हौ

राम रहीम रै नांव माथै

हिंसा करावौ हौ।

थें बिसरग्या कांईं कबीर नै

जै जाणै हा कै

वो हर घट मांही बैठ्यौ है

बारै खोजणौ मूरखता है।

सूर, दादू, मीरा अर नानक

सै बतायौ कै वो अेक ही है

नांव भलांई न्यारा-न्यारा है।

इण बात नै सै जाणग्या है

अबै धरम रै नांव माथै

फिरका परस्ती री बातां बेमानी है

सम्प्रदाय अर अळगाव री बातां थोथी है

मंदिर अर मस्जिद

गुरूद्वारो अर गिरजौ

प्यार रौ सनेसौ देवै है।

पछै कैई गैला

कुमारग क्यूं बेवै है?

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : विनोद सोमानी ‘हंस’ ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-17
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