अेक
खूंटो ऊंडो रोपो
माड़े खूटै सूं डांगर तुड़ा जावै।
बात जे
रै जावै काच्ची
तो बा
मिनखां रा सिर
फुड़ा देवै।


दो
बै अजे तांई
सूरज रै साम्हीं मूंढो कर'र थूकै।
स्याणां कैया करै
कै गादड़ै री जद
मौत आवै तो बो
गांव में आय कूकै।

तीन
कसूर गायां रो
जकां नै खाया नाग
बै स्सै रा स्सै
साव बचग्या
अर जकां नै
डसग्या नेता
बै असपताळां में ई
पचग्या।


च्यार
चौधर आच्छी घणी लागै
जे थे करो अर
म्हानै सैवणी पड़ै...

आई चौधर
चुभण लाग जावै
जे करां म्हे अर
थांनै सेवणी पड़ै!

आ बात खारी भोत है
पण
बात नै तो
बात कैवणी पड़ै।

पांच
आपां
जकै ठाणां माथै
नीरता गा
बठै अब गोधा
चरण लागग्या...

कसूर गायां रो
जाबक नीं है
आपां ई अब
गोधां सूं
डरण लागग्या।

छह
कुमाणस बेटा
बूढै बाप नै
मा नै
घरां सूं काढै...

अै कळजुग रा
पूत है
जिण डाळी माथै बैठै
उण डाळी नै बाढै।

सात
भूखै नै
राम नीं मिलै
अर
मर्यां बिन्यां
अराम नीं मिलै...

आं मोट्यारां रो
खून उबाळो खा जावै
जे आं हाथां नै
काम नीं मिलै।


आठ
थूं
आथूंणै खेत गई
बेलड़ी ल्यावण
अर हूं गयो अगूण
रेवड़ चरावण...

थां सूं नीं उंचीजी
बेलड़ी री पांड
अर म्हां सूं
घिर्यो नीं रेवड़!

थां सूं छूटै नीं बेलड़ी
अर म्हां सूं
छूटै नीं रेवड़!

 
थूं ई बता
आपां ओज्यूं
कद मिलस्यां
आपणी पुराणी ठौड़।

नौ
म्हैं आंख्यां सूं ओळख्यो
जद भी म्हारो गांव
खुल्या ठेका दारू रा
कठै ई जूवै रा ठांव!

भींतां सूं भींतां लड़ै
लड़ै मिनख री जूण,
भूखां ई मरै चिड़कली
कागला खावै चूण!

कांटां सूं छुलगी
अे गळ्यां
कठै धरूं पग-पांव
म्हैं किंयां ओळखूं
म्हारो गांव।

दस
थूं
फूटरी घणी लागै
जद थूं
म्हां सूं
दूर होवै।

थूं
ओज्यूं
फूटरी होवण
म्हां सूं दूर
कद जासी।

इग्यारा
लोग
तारा गिणै
म्हें गिणूं रात
जकी आपां
भेळी बिताई
बे रात..!

स्रोत
  • पोथी : चौथा थार सप्तक ,
  • सिरजक : सुरेन्द्र सुंदरम ,
  • संपादक : ओम पुरोहित 'कागद' ,
  • प्रकाशक : बोधि प्रकाशन
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