काटो जंजीरां काटो

हिवड़ै री खायां पाटो

समता री जाजम बैठो, ममता रा मोती बांटो।

बूंदां रा आंसू पूंछो,

समदर खुद ही मुळकैलो।

दर्पण रा दाग मिटायां,

मूंडो कीकर चिलकैलो।

घुटबा लाग्यो अब तो दम, बोतल रो खोलो डाटो।

गैला, गैलो बतळाओ,

आंख्यां वाळां नै कांईं।

उजळा-उजळा उजियाळा,

बैरी, चमचेड़्या तांई।

तिरबारी बातां बोलै, छाती पै बांधै भाटो।

माथो ही कटतो होतो,

केसां री सोधी कुणनै।

घर बाळै हाथ तपावै,

कोई कैवै कै उणनै।

सोनै री चिड़कल भूखी, आटा रो घर में घाटो।

खोळ्यां बदळो अै मैली,

मिंदर री खिड़क्यां खोलो।

तिरंगा झण्डा हेटै,

इक रंगी बोली बोलो।

पुरखां रा सहद लगाके, खारी कुर्‌स्यां नै चाटो।

मूंछां मोड़ै सिंहासण,

चांदी री करै दुहारी।

मिनखाई दुबळी होवै,

बढ़ती जावै बीमारी।

सी-सी करकै भी पीवै, अमल्याणो मीठो-खाटो।

स्रोत
  • पोथी : जागती-जोत ,
  • सिरजक : त्रिलोक गोयल ,
  • संपादक : दीनदयाल औझा ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादेमी, बीकानेर (राज.) ,
  • संस्करण : फरवरी, अंक 12
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