ऊंची उठती कऊ री लपटां

खीरां री दहक अर

सिंझ्या रौ सिणगार—

उण रात वगत जांणै थमग्यौ हौ।

आग में नीं तौ पूरौ उजास हौ,

नीं पूरौ अंधारौ,

बस सत्ता रौ ताप हौ।

कऊ रै च्यारूंमेर घणकरा तौ

ठाकर रा सलाहकार इज बैठा हा,

भारी पोसाकां अर मूंछां री अैंठ में।

आज हथाई कम अर

हुकम रौ हाकौ भारी हौ...

सी में धूजती हवेली री भींतां, जमींदारी री ऊंधी रीतां,

अेक सलाहकार बोल्यौ—

''इण बरस भलांई पाणी ओछौ हौ,

अनाज री उपज कम व्ही,

पण तौ हासल पूरौ वसूलणौ है।''

कऊ री झाळां औरू ऊंची उठी,

हुकम उठावणियौ हरकारौ—

झाळां सूं अळगौ व्हैतौ

चुपचाप हाथ जोड़्या ऊभौ रैयौ।

स्रोत
  • पोथी : कऊ री झाळ ,
  • सिरजक : प्रमिला शंकर ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी ग्रंथागार ,
  • संस्करण : प्रथम संस्करण
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