रात घूंघटै में मुळकै, चूंदड़ली ओढ्यां तारां री।
चांद में चरखो कातै है, बा बुढ़िया माई सुरगा री।
सुरगा री धोळी चांदड़ली, ठोकर सूं जाणै ढुळगी है।
रूंखां रै माथै नखराळी, आभै सूं आई बिखरी है।
धोरां रै कण में रमगी–बाळू री सेजां पोढ्या है।
विसराम करै है बांठां में, चांदी री चादर ओढ़्यां है।
तो सांसां सुळगै सेजां में, जोबण री बाजै पुरवाई,
आडै में नजरां अटकी है, क्यूं बैरण रैण भलां आई।
कितरी ही सिणगार सजै, महैलां री पेड़्यां चढ़ जावै।
हां! कुदरत रै न्यारै घर न्याय कठै, कोई मुळकै है कोई तरसै है,
कोई चांदी सोनै तुलर्या है–कोई रोटी-ममता नै तरसै है।
मुखड़ै पर चादर नाख घणी, सोबानै सोवै है दुनियां।
पण मन री बातां कुण जाणै, कुण-कुण की काया सुलगै है,
नैणां री सूनी पिणघट पर, कद कुण री गागर ढुळकै है।