सूखी तळाई री फीकी पाळ पर
बैठ्यो कवि
कल्पना रो आनंद लेवै हो,
जाणै
च्यारूंमेर हरी-हरी घास उगी है
गायां चरै है
बाछड़ियां छोळ करै है।
भांत-भंतीला फूल खिल्या है,
रंग-बिरंगा पंछी गावै है।
तीर रा हर्या-भर्या बिरछ
पाणी में झुक-झुक झांकै है।
पणिहार्यां रो झूलरो घड़ा भरै है,
अर
मन रै मोद रा गीत गावै है।
उमंग-भरी तळाई
रमती-पून रो हियो सिळावै है।
मोती बरणै नीर ऊपरां
चांदी बरणो हंस तिरै है।
इतरै में ई
भंभूळियो आयो
अर कवि रो सुपनो टूट्यो–
तळाई रै फाट्योड़ै हिरदै में
धूळ उडै ही
तिस मरतै रूंखा में
पून सरणाटा मारै ही
न कोई पंछी अर न कोई मिनख जायो।
पुराणै पीपळ रै
खोखलै में बैठी,
बस अेक कोचरी
आंख्यां टमकावै ही।
कवि री कल्पना रो
हंस उडगो अर उण री ठोड़
यथार्थ री कोचरी आगै आई।
कवि, कल्पना रो हंस
मन भावतो है
तो यथार्थ री कोचरी भी
कम रूपाळी कोनी।
हंस रै गीतां साथै
अब कोचरी रा भी
गुण गावो।