थारी देह
बिरमा जी रा हाथ सूं बणयोड़ो
गुलदस्तो है;
जिंरी ओपमा मूंडा सूं बखाणी नीं जावै;
कागद पै मांड़ी नीं जावै।
नैण देख मन में गुदगुदी ल्यावै,
पण अै नीं बोलै नीं लिखै;
अण बंटी चिट्ठी ज्यूं लौट-लौट आवै।
थारै नैणां में च्यारूं कूणै
लम्पट छोरा रै लारै–
वांरो चित्राम भी मंड्योड़ो है;
ज्यों थनैं देख सीटी नीं बजा–
अेक लांबो सांस खीचै।
थारा रूप नैं संजोवण सारू
थारै जायां पछै आंख्यां नै मींचै।
थारी सांसा में फूलां रो बाग
जणी में नत हंसी री गोठां होवै।
थारा होठ नदी रो दो पाट
ज्यां में रस री गंगा बैवै।
थारै मन में घणां-खरा सुपना है–
बालपणा री मीठी नींद भी,
पण थनै वा नींद क्यूं नीं आवै
बार-बार पसवाड़ो क्यूं फेरै,
थनैं बता द्यूं कै म्हूं म्हारी नींद
थनै देबो चाहूं हूं;
थूं थारी नींद म्हनै दे दे!
नींद रो आंटो-सांटो कर ल्यां;
नैणा में नुंवा सुपना भर ल्यां।