अबै म्हैं सड़कां माथै नीं जा सकूं
म्हारी कमर मोटी हुयगी है,
आंख्यां नीचै गैरा काळा खाडा बणग्या है
आं सगळां नै निरख‘र म्हनै लाज आवै
पण फूलां सूं भर्योड़ी अेक डोलची लाओ
अर म्हारै कनै, साव म्हारै कनै उणनै धरौ।
धीमै-धीमै बाजा माथै कोई मीठी धुन सुणाओ।
उणरै सारू, फगत उणरै सारू
म्हैं समदर में डूबणी चावूं...
म्हैं म्हारी देही नै गुलाब सूं सजावूं
अर उणनै सूवतां सुणावूं अमर गीत
कुंजां में बैठ’र घंटां म्हैं संचूं हूं सूरज रौ ताप
के म्हारै में फळां रै रस सरीसौ
इमरत (मधु) घुळ जावै।
चीड़ रा वनां सूं आवती हवा
म्हारै मुख नै हेमळ बणाय जावै,
उजास अर वायरौ म्हारै रगत नै जाडौ अर
सुद्ध कर दै
उणनै निरमळ बणावण सारू म्हैं अबै नीं तौ
घिन करूंला अर नीं गपसप। फगत प्रेम,
क्यूं के इण सांयत में, इण इकांत में म्हैं
बुण रयी हूं अेक सरीर
तूंतड़ा सूं बणी अेक अद्भुत देही,
अेक चे’रौ, आंख्यां
अर हिवड़ौ निपाप।