दिन छिपतां ई डूब ज्यावै
म्हारौ गांव
अेक गहरै अंधारै अर उदासी रै
दरियाव में!
सुण्या करता टाबरपण में
के म्हारै गांव में
रोसनी री खेप उतरैली
अर सैचन्नण हुज्यासी आभौ
धरती
म्हारा घर!
पण बो सुपनौ
हाल पूरौ कोनी हुयौ
(स्यात् अधूरौ रैवणौ ई सुपनां
री मजबूरी है)
दिन छिपतां ई दबोच लेवै
गांव नै
अेक आदमखोर मून
अर बीं रै पंजां में
तड़फड़ावतौ, प्राणां री भिच्छ्या
मांगतौ रह्वै गांव।
बीयां हारी बीमारी में अठै
ओझा है
देवी-देवता अर पित्तर है
रामदेजी, तेजौ, गोगौ
बाबौ हरिराम, गुंसाईजी
कोई-न-कोई तो
बिठा ई देवै बात रौ घड़;
डांगरां री बीमारी-सीमारी में
सै सूं चोखौ इलाज है
अठै पाबूजी री फड़।
कदै-कदै तो इयां लागै
सुरजी रै ग्रहण लागग्यौ
बीं री किरणां पूरी-पूरी कोनी आवै
फेर बी गांव बिच्यारौ
कद स्यूं बैठ्यौ है ई आस में
के रोसनी री खेप उतरैली
अर सैचन्नण हुज्यासी आभौ
धरती-म्हारा घर!