पड़ै घणो ठेंठार

ओढ रजाई बादळ री

मुंह काढै सूरज माड़ो-सो!

सिंझ्या बाळी आग

पटक रजाई दूर

बैठ्यो धूणी तापै सूरज...

चालै ठंडी पून

गुदळकै सी मार मुंह-ढाटो

आभै भीतर लुकग्यो सूरज!

ढूंढ्यो साथण रात

चांद- च्यानणो लियां हाथ में

दिनुगै जातां लाद्‌यो सूरज॥

स्रोत
  • सिरजक : जगदीश गिरी ,
  • प्रकाशक : कवि रै हाथां चुणियोड़ी
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