डागळै ही डागळै पै डोलता रह्या।
तळघर तांई सूरज टंटोलता रह्या॥
बापूजी मर्या तो माथै पागड़ी बंधी।
राजघाट खून सूं खंखोलता रह्या॥
बुगला धरम कांटा हाथ में लियां।
ताकड़ी में काण राख तोलता रह्या॥
सबड़ी समाजवादी राबड़ी स्वाद।
बापड़ी री राबड़ी नै ढोळता रह्या॥
दूध सी दुपेर हुई नींद न उडी।
कूकड़ा कुकड़ कूं बोलता रह्या॥
सील सदाचार रा जो सबक सिखाय।
बोतलां रा काग, कस खोलता रह्या॥
गांव-गाव कांव-कांव क्रांत्यां करै।
पगथळ्यां री ब्यावां नै पंपोळता रह्या॥
टेढ़ी-टेढ़ी झांक रही न्यारी-न्यारी फांक।
नारंगी रै छूंतरां नै छोलता रह्या॥
‘जीजा’ जिनगाणी तो तिसाई मरगी।
मिनखाई में मीठो जैर घोळता रह्या॥