धोरै माथै अेक झूंपड़ो,

जिणमें रैवै असली भारत,

घाट उबळती खड़-बड़ सीजै,

गधो गुड़कतो पाणी लावै।

धोरै माथै अेक झूंपड़ो।

धौळी धजा फरहर फरहै,

राम देवरो राती जागो,

रात आंवती वीणां झणकै,

जीजो झणकार झणकै।

धोरै माथै अेक झूंपड़ो।

फूस झूंपड़ो फटका मारै,

गूदड़ राली माथै पड़िया,

अेक खाटड़ी ऊभी कींनै,

दूजै कानी गाभा सूखै।

धोरै माथै अेक झूंपड़ो।

टाबरियां रो टोळो बणियो,

कई बगत में निरणां सोयजा,

अेक गूदड़ी सगळा ओढ़ै,

इण भांत सूं भारत पनपै।

धोरै माथै अेक झूंपड़ो।

कुटुम्ब कबीलो सगळो इण में,

जीवण जमारो जबरो जचियां,

सुख-दूख री दैण कोयनी।

धोरै माथै अेक झूंपड़ो।

हम दो, दो हमारे,

सुखी जीवण रो नारो देश रो,

इण माटी अनभिज्ञ रैयग्या,

दुरता मन सूं आवै कोनी।

धोरै माथै अेक झूंपड़ो।

असली गरीब पिछड़िया अजै तांई,

नई योजनावां लुकगी इण सूं,

भारत देस री भावी पीढ़ी,

सुधरै जद ही नकसो बदळै।

धोरै माथै अेक झूंपड़ो।

आंक जोड़ियां कागद भरसी,

गरीब देस रा मिटसी कींकर,

सुख समृद्धि महलां चढ़गी,

फूस झूंपड़ो आसी कींकर।

धोरै माथै अेक झूंपड़ो।

न्यूतौ म्हारो नवभारत नै,

आवौ जणां तो आंख दिखाऊं,

पगै उरबाणां फिरता बाळक,

बिना वस्त्र बैठ्या रैता।

धोरै माथै अेक झूंपड़ो।

जापा जणती नारी जिणमां,

धरती सोती अम्बर औढ़ती,

इण भांत सूं नवयुवक पळता,

बीती नहीं है आज भी होती।

धोरै माथै अेक झूंपड़ो।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : कानसिंह भाटी ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-33
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