रंभा ज्यूं रूप धर्‌यौ धरती,

जग सै नै बिलमावण नै।

भंवरा ज्यूं मिनखा टूट पड़्या,

रस ऊपर जा मंडरावण नै।

विध-विध रंगा म्हां फूल खिल्या,

जुवती रो अंग सजावण नै।

बूंदा बण मोती निरख रह्यी,

रंग रेल्यां रूप निहारण नै।

रूपाळी सेज बिछा धरती,

तनड़ै में जोबण ढांक रह्यो।

बण काम बायरो उछळ रह्यो,

छवण री रळियां छाय रह्यो।

कळ-कळ बेय रह्यी सरिता,

रुण झुण ज्यूं नवरा बता बोल।

नट ज्यूं अै रूंखा नाच रह्या,

ईं भोम रूप रस डोल डोल।

आभै में आग्या बादळिया,

नेहां रो नेम निभावण नै।

हरखण लागी अै दामणियां,

आली रो देस दीखावण नै।

कोयलड़ी गावै है न्यारी,

बाई नै प्यारी गीतड़ल्यां।

ढोरां नव इण सूं प्रीत पाळ,

झूमै ठाडी कर आंतड़ल्यां।

मिनखा! मत हिचकोळा मारो,

रूपां रो सागर गहरो है।

नैणां में न्याव राख चालो,

विधना रो सगळो पहरो है।

जै कूद पड़्या थण-कमल देख,

भंवरा ज्यूं जा रस पीवण नै।

दिन ढळतां पांखड़ल्यां करसी,

रस्ता सै बंद लजावण नै।

रंभा ज्यूं रूप धर्‌यौ धरती,

जग सै नै बिलमावण नै।

भंवरा ज्यूं मिनखा टूट पड़्या,

रस ऊपर जा मंडरावण नै।

स्रोत
  • पोथी : जागती-जोत ,
  • सिरजक : सोहनलाल जोशी ,
  • संपादक : कन्हैयालाल शर्मा ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादेमी, बीकानेर (राज.) ,
  • संस्करण : सितम्बर, अंक 07
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