धमनियां रगत व्हेला
जदी तो उबलेगा
विषमता देखी नै,
पिघलेगा
करूणा बण नै,
फूटेगा
संकळप रो अंकुर बण नै
बदलवा-समै री धार—
नदियां री दिसावां,
झुकावा
मगरा रा गरब तण्या माथा।
धमनियां में रगत व्हेला
जदी तो मरजादित व्हेगा
सील बण नै,
चमकेला
ओज बण नै
प्रगटेगा
प्रज्ञा बण नै।
धमनियां में रगत व्हेला
जदी तो दहकेगा
अंगारो
साजिसां नै
भस्मी भूत करवा।
जदी तो मिनख बणगा
भूख, नींद अर
भय सूं ऊपर उठ
तिल-तिल जली नै
पल-पल गली नै
आलोक फेलाणियो
महा मानव।
पण
रगत
प्रयोगशालावां में
परखीजियो
द्रव मातर कोनी व्हे
—कोनी व्हे
धोळा अने राता कणा आद रो
संजोग मातर।
रगत होवे है
पुरखां रो संकळप अर संताप
होवे है
माता रो सील
पिता रो आदर्श
गुरु री दक्षिणा
बंधु रो ममत्व
मिंतर री सगती
अर समाज रो
अवदान।
रगत नै
विज्ञान री
प्रयोगशालावां में ई नीं
मिनख री संस्कृति
अर सरोकारां रा
परीक्षणा सूं बी
गुजरणो होसी
जदी'ज बणेगा मिनख
वणेला जगत
नीं तो
मदारी व्हेगा
वांदरा व्हेगा
अने व्हेगा भीड़
जिण री धमनियां में
थोड़ो घणो
रगत व्हेगा बी तो
प्राण नी व्हेगा।