म्हारी कैड़ी ओळख

म्हारी कैड़ी पिछाण

म्हैं कुण?

आपरै खेत रौ निनाणियौ

घर रौ भोगळियौ

गायां रौ गुवाळियौ

सतखंडी मंजलां माथै

तगारी पुगाणियौ

चोर-चकारां सूं सावचेत

राखण सारू

देवळी बण्यौ ऊभौ दरूजां माथै

सतपौरी सियाळै री रात

कागद चुग-चुग’र रात जगावणियौ?

फगत थांरी रिछ्या सारू

थै नीं जाण सकौ म्हैं कुण

म्हूं जद सियाळौ तापूं

आप मखमलिया रजायां में

पसवाड़ा फोरौ

सियाळौ थांरै खातर

कतई नीं दोरौ

म्हैं मिल रै भोपू दांई

सावचेत

हरमेस जागेड़ौ

घड़ी दांई टंगेड़ौ

सूइयां दांई भाजतौ

म्हैं थारै खातर

सदा रैयौ फोरौ

रेल्वे ठेसण हुवै के बस अड्डौ

आपरी हेली हुवौ या नोरौ

म्हारै पसीनै रौ मोल

म्हैं थां सूं किण बिध मांगू...

म्हैं थांरै खातर कुण?

स्रोत
  • पोथी : माणक (पारिवारिक राजस्थानी मासिक) ,
  • सिरजक : श्याम महर्षि ,
  • संपादक : पदम मेहता ,
  • प्रकाशक : माणक प्रकाशन ,
  • संस्करण : फरवरी 1986
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