अेक

आपणी जलम जात गादी नै
पुन्न रो परताप मान’र
घणै गुमेज सूं रैणिया
आभै रा ऊंचा तारा!
व्है जावो चतरबंग
पड़ जावो पीळा
धूजण लागौ भौ सूं
देखो थांरै सामी आयग्यो है
वो बीर मंगेजी काल।
आपरै रगत कवच माथै रातो पुसप लगायां,
आपरा ठिकाणा नै दरसावतो।
सुणो!
वो आय रयो है करै भी पावै री निछांत धजा नै
लीलैपण सूं फैरातां
जुग नै नुंवो बणावण सारू दुनिया नै बेच देवण खातर
वै सगळा राग रंग ज्यारै माथै
थे कब्जो कर लीनो है।
वो जुग जिको अपणै आपणै इक्कै-दुक्कै
तारां री मुळक जोगो बणायां ऊभो है,
आज धग-धग धूज रैयो है।
सुखां पानड़ां री कोरां माथै।
अबै सैणा करसां रा रूप
बध्योड़ै आणद री उत्तम जोत लेर
थां लोगां नै दाखल देवैला,
चतरबंग व्है जावौ पीळो पड़ जावौ भो सूं धूजो
थार सामो आय पूग्यो है
वौ बीर मंगेजी काल।
 
दोय

भाळां अब औ समदर जीं रो हिरदो
धग-धग कर रैयो है
अर औ आभौ जिको उमाव में छानोमानो व्हेग्यो है
बगत रा उण अैलान नै सुण’र
जिको उगूणी ढाळ माळ
अजब-गजब लिखियोड़ो है
उण सोवणी उजास आळी तांबापाटी पै
औ जिकौ दीस रैयो है।
सांची, वा समदर मैं लीला पाणी री रेख कोनी,
पण म्हैं बांच रैयो हूं उण अैलान नै
थांरो भलो व्है
लीला आभा नीचै जीवणिया सगळां जीवां रो
आगूंच में नी रैवैला देवाळो
इण सोन परभात मैं राजा भोज अर गंगू तेली
सबरो बरोबर सीर है।
अबै व्है जासी पांचू आंगळियां अेक जिसी
अठै मंडोर री बेलड़ियां नै
उळझियोड़ा बादळां रा गोता
दोयां री निपज व्है सकै।
सगळा हरखावो
सै नै धापवां मिळ जासी भलो बायरो नै भलो उजास
दूजा रा दुख में आनन्द सूं रैवणिया
धन भागी नछतर थनैइज ईं मैं ठौड़ नी मिलैली
घबराऔ व्है जावो चतरबंग
पीळा पड़ जावौ भौ सूं धूजण लागौ
अबै भाळो थां रै सामी आय पूगो है
वो बीर मंगेजी काल।
 
तीन

 

हे करसा थूं अबै राजी व्हैजा
आयगो है काल बेमाता रा दुखिया लेख नै मेटणसारू
थूं जमी नै हरियल सुरग दीनो, पण अधनागो रै’र खुदरो जमारो काट्यो,
थूं देस नै सोन पांख दिया, पण देस थारी बेदखली कर न्हाखी,
क्यूंकै थारै माथै लैणियो अणूत चढग्यो है।
थूं दूजां नै नैनां नै थाकोड़ा नै सुख बैंचियो
पण थूं तरसतो रैयो मुळकण सारू जे थारा रगत में तप नी व्हैतो
औ देस हीमाळो व्है’र थर जावतौ,
पण थारा लीलाड़ माथै जे नीं पळकता मैणत रा मोती
तौ औ देस व्है जावतो उजाड़
कदैई थारा कणिया देसबोझ सूं लुळ्या,
पण अबै देस बोझ मान’र लुळ्यो जा रैयो है
जिकी जमी खेत खड़ण आळा रा पग झेल्या,
हळ रै फाळ री घरण सह्या
उण घण मोली जमीं नै छोड’र फेर कठै नीपजै हरख।
अर नी फिरै भाग रा दिन,
नी आवै पुसप मांय गमक
आय पूग्यो है काल
न्याय ताकड़ी लेय’र खोटा खरा रो हिसाब करण नै
हे करसा!
अब थूं भलीभांत राजी व्हैजा, हरख मनालै।

 

स्रोत
  • पोथी : जागती-जोत ,
  • सिरजक : गोविन्द शंकर कुरुप ,
  • संपादक : कन्हैयालाल शर्मा ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादेमी, बीकानेर (राज.) ,
  • संस्करण : मई, अंक - 03
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