मर खूटा बडेरां रै नामून–

मद छक नसा में गैळीज-गैळीज–

म्हैं पांगळै मोद

सूनै आखरां री सनक पाळ।

म्हारै माथै मोत्यां रा थाळ मत वार।

पोर-पेगम्बरां नै

बिना मौत मरता जोय

म्हारौ भरसौ दिनौ दिन

ढळतौ लखावै।

म्हारै संजोग री उडीक में–

मन मोळौ मत कर।

कांमेतण थारै अर म्हारै बिचाळै

पैलां वाळौ गनौ रुळग्यौ;

फगत

रोटी रै तांतै बन्धयोड़ा पूतळा हां।

आंगळियां रा पेरवा आंमीजग्या;

माहौ माह अेक दूजा री लोथ रा

झिरोखा खोलण री जुगत साटै

अरथ विहूण अरथ–

आंतरै ढळग्या।

अदीठ व्हैगौ म्हारौ बागी

नै थारौ हेताळू सुभाव।

आपां जीवण री खींचातांण में

आंमण-दूमणा

छांनै-मांनै इण धांमला

रै सातरवाड़ै

मूंडौ ढेर कूकां

बारूं मास; बत्तीस घड़ी

माथै झूरती मौत सूं

लुक-मींचणी रमतां–

म्हारी कंचन काया रौ करार–

तर-तर छीजतौ जावै।

म्हारौ जूझारू सुभाव पड़ थाकै

थारै तांई पूगतां-पूगतां

काठौ लातर जाऊं;

पांणी रै बुड़बुड़ियां परवांणै–

छिण पलकां मिटतौ जाऊं!

स्रोत
  • पोथी : जागती-जोत ,
  • सिरजक : चन्द्रप्रकाश देवळ ,
  • संपादक : कन्हैयालाल शर्मा ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादेमी, बीकानेर (राज.) ,
  • संस्करण : अगस्त, अंक 06
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