कांई मांडू?

कश्यां मांडू

हथेळी में उग्याया थापाथूर,

म्हूं डरपूं छूं

जे थनै छू लूंगो तो

थारा डील में

चुभ ज्यागा काटां ही काटां।

कश्यां मांडू

म्हारी ही आवाज़ का चतराम

डरपूं छूं

के म्हारा होठां का भाग की लकीरां

घायल न्हं करदे

थारो ही नांव…

कश्यां मांडू

आसमान के तांई

बांथ में भर लेबा को सपनो

म्हारी बाह्यां

अतनी समरथ न्हं होई छै अबार

डरपू छुं

कै मुट्ठी में बांधतां-बांधतां

छटक न्हं ज्यावै

सगळा सितारा…।

पण म्हूं

थंई खो देबा सूं भी डरपू छूं

या बात भी कश्यां मांडूं म्हूं?

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : अतुल कनक ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक–18
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