आंगण री माटी में

जावतै बरस री

पग-धुन में

सुख सांवठौ नीं रियौ

ओढणै रै पल्लै में बंध्योड़ा

दुख छेवट कद तांई चुपचाप

बैठता?

पण सावण री झिरमिर,

भादवै रौ मेह,

काती रौ उजास—

तौ इणरी पोटली मे इज

बंध्योड़ौ हौ,

जिकौ म्हैं हाल तांई

म्हारै रेसमी बुगचै में

अंवेर राख्यौ है...

कुण जाणै—

कित्ता’क वचन अधूरा रिया'नै

कित्ता’क पूरा व्हिया

कुण जाणै—

कित्ता’क सुपना

रात री छाती में

जागता रिया?

जावतै बरस री उसांस

म्हैं कदैई नीं भूली...

आज थनै ओरण री ओट—

मारग में दिवलां रै उजास

विदा कीनौ

आवतौ बरस—

सुभ मंगळ रा

पगल्या लियां आवैला

इण आस में

जोती वेळा में,

अरदास करूं कै

मां थूं लोवड़ी

री ओट में सदैव म्हारै

सागै सागै चालसी।

स्रोत
  • पोथी : सुवालड़ी (राजस्थानी कविता संग्रै) ,
  • सिरजक : प्रमिला शंकर ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी ग्रंथागार ,
  • संस्करण : प्रथम संस्करण
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