बेटी रौ इज दूजौ घर क्यूं व्है?
कदैई बाप रौ घर,
कदैई भाई रौ घर,
कदैई धणी रौ घर!
क्यूं नीं व्है कदैई मां रौ घर
बेटी रौ घर?
पूछै सरवर नाडियां
पूछै सीम तळाव
पूछै घर रौ आंगणौ अर
पूछै तरवर रूंख।
बेटी पांख पसारता पांखी नै पूछै
जिण रौ व्है आकास,
वा पूछै धोरां री धरती नै।
बेटी पूछै—
मां पैली वार जद थारी छाती सूं लाग’र
म्हनै सोरी नींद आई,
क्यूं नीं लिखीज्यौ
घर री भींतां माथै म्हारौ नांव?
क्यूं नीं लिखीज्यौ सूरज पूज्यां पछै
आंगणै रा मांडणां मांय
म्हारौ नांव?
बाबोसा री आंगळी पकड़’र म्हैं मोटी व्ही
पछै क्यूं म्हनै चौखट पै
मेहमान रै ज्यूं बिठाई मां?
क्यूं जोई म्हनै दूजै घर मेलण री बाट,
क्यूं जाणी म्हनै बाळपणै सूं पराई।
क्यूं मानी बेटी नै परायौ धन?
क्यूं लिछमी नै काढी
क्यूं अपणायत में
देखी विदाई री बाट?
कुण बणाई आ रीत?
क्यूं कांप्यौ मां रौ काळजौ
क्यूं घूंघट मांय भीज्या बाईसा रा नैण?
आभौ धरती नै पूछै
सबसूं पैली
कुण री बाई सासरै सिधाई?
कुण बटाऊ लेवण आयौ?
पूछै वौ पिणिहारी नै—
‘थूं रोज पिणघट सूं पाणी लावै,
पण बोल पिणिहारी थारौ
खुद रौ कुंवौ किसौ?''
पूछै आभौ चरवाहण नै—
''थारी बकरियां नित री चरै
तौ बोल थारौ धोरौ किसौ,
बता थारौ मन अर थारौ आंगण किसौ?''
इण सवाल माथै सब
चुप रह जावै
उणां री आंख्यां मांय
सदियां रौ धुंधळौ धूंवौ खारौ पड़ जावै।
केई सवाल अगनबाण ज्यूं उठै
पण उत्तर रा उजाळा
सीतळ जळ री धार बण’र ठाडा पड़ जावै।
‘लुगाई रा लेख अर भाग तौ बेमाता लिख्या।’
बेमाता नै कुण पूछै अर
बेमाता सूं कुण मिळै
माता जद अैड़ौ विधान लिख्यौ
बेटी कीकर टाळै?
वा तौ आग्या में चालै
दिन भर आंगण बुहारै,
चूल्हौ सिळगावै,
कणक पीसै,
रोटियां सेकै,
टाबरां नै पाळै,
बूढां-बडेरां री सेवा करै
पण पाछौ सवाल नीं करै
छानै-छानै उण री आंख्यां झरै
रात नै चांद हंसै
अर उजास बिखेर देवै।
वा सुवा, कुरजां, बुगला, मोर नै
देख’र आंख्यां मींच लैवे अर
कैवै सरवर नाडियां ई गावैला,
तरवर रूंख लहरावैला।
आंगण बाट जोवैला।
पण बेटियां कदैई कोई सवाल नीं करैला।