रात सांझ नै हार दिखावै।
तारा रळ-मिळ हंसी उडावै।
परभाती थारै सामै तो
रात रूळै रेती मिल जावै।
रात उणमणो मन ले जावै।
चांद उणमणो तन ले जावै।
परभाती सूं निजर बचाती
तारा नोलख धन ले जावै।
चूनड़ चीर-चीर हो जावै।
जावतड़ी आंसू टळकावै।
परभाती रै आंगण आतां
आंसूड़ा मोती बणजावै।
ऊभी होय, कमर लुक जावै।
चालै तो सांसा उठ आवै।
परभाती कंवळी काया पर
इतरौ सोनो क्यूं जड़ ल्यावै।
जुगां-जुगा सूं साज संवारी।
रूपाळी छिब बेहद थारी।
अेक बात रो भेद बतादे
परभाती तूं किंया कंवारी?
प्रीत करै कुण सूं अलबेली,
जग में दीखै निपट अकेली?
प्रीत डगर जातां हिव थारै
होतो व्हैलो दरद नवेली?
इतरी बात बतादे म्हानै,
बणै-ठणै इतरी तूं क्यांनै,
सपना में सोवै जग उण पलां
क्यूं आवै तूं छानै मानै?
नैण झरै नित धड़कै छाती,
पढ़ी नही पण भेजै पाती।
आणू है तो आ मन लोभी,
घणी अडीकै नित परभाती!