कान कतरियो भोमा भरियो

सावण फागण कण करियो?

आप हिमाळो पाणी पीगो,

गंगा होगी पांगळी।

धरमराज पकड़्यां हांडै है,

दुरियोधन री आंगळी॥

फूलां नै तो भंवरा चूस्या,

अब भंवरां री बारी है।

क़ैद करो लोभी भूंरां नै,

जद मुळक़ै फुलवारी है॥

गादळ छोडी है जोड़ै में,

जीव तीसाया बण गमगा।

रुत रा खोज बोजां में रुळगा,

नैण अंधेरै में ननगा॥

सूरज रै आगै ढ़क दीनी,

भाग बादळीये सांकळी।

किरणां री फंसगी दीखै है,

अब चै’री में आंगळी॥

मौसम पल्टो खातो जावै,

मांदो पड़गो बाजरियो।

मंजिल क़ैयां भाग्यां पावै,

जद चूनेड़ो बायरियो॥

स्रोत
  • पोथी : जागती जोत मई 1982 ,
  • सिरजक : तारासिंह ,
  • संपादक : चन्द्रदान चारण ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी भासा साहित्य संगम अकादमी (बीकानेर)
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