हिवड़ै मैं खटकै पीड़, सुणाऊं कठै-कठै?

नागी हुई है लाज, छिपाऊं कठै-कठै?

सै री निजर काची पड़ी, स्वारथ री चूंध सूं,

चस्मौ लगायां भींत व्है, जाऊं कठै-कठै?

दौलत अगणी टोपियां, कै तूंद रै पड़ी

पीढियां रो ब्याज, चुकाऊं कठै-कठै?

जो आब बांटतो हो मुलक, सगळै खलक नै

उण आंधड़ै री लाकड़ी, लाऊं कठै-कठै?

सपनां में जियां उमर भर, वै बिखर गया

दागी है सगळा फूल, सजाऊं कठै-कठै?

मौसम रै रंग सूं रंगीजै जिणरी टोपियां

उण टोपियां रै भोग लगाऊं कठै-कठै?

स्रोत
  • पोथी : जागती-जोत ,
  • सिरजक : रामेश्वर दयाल श्रीमाली ,
  • संपादक : कन्हैयालाल शर्मा ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादेमी, बीकानेर (राज.) ,
  • संस्करण : जून, अंक 04
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