आंगण में उग आया थापाथूर, बचता रीज्यो

बचता रीज्यो, हां-हां रोज हजूर, बचता रीज्यो

आज हथेळी में रै क्हाल की आस कसी?

बैवार भायलां को छै खुलो कपूर, बचता रीज्यो

जतना मीठा होठ, कड़ी उतनी बातां

बरसां सूं यो को यो ही दसतूर, बचता रीज्यो

दुख सांसां का सरणाटां सूं भी नीड़ो

सुख, नजर्‌यां पूगै जतनो दूर, बचता रीज्यो

स्रोत
  • पोथी : जागती-जोत ,
  • सिरजक : प्रेमजी ‘प्रेम’ ,
  • संपादक : कन्हैयालाल शर्मा ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादेमी, बीकानेर (राज.) ,
  • संस्करण : अप्रेल, अंक - 02
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