वियोग पर सोरठा

वियोग संयोग के अभाव

या मिलाप न होने की स्थिति और भाव है। शृंगार में यह एक रस की निष्पत्ति का पर्याय है। माना जाता है कि वियोग की दशा तीन प्रकार की होती है—पूर्वराग, मान और प्रवास। प्रस्तुत चयन में वियोग के भाव दर्शाती कविताओं का संकलन किया गया है।

सोरठा13

कामण सयणां कीध

जिनहर्ष मुनि ‘जसराज’

करी मन धीर करीर

जिनहर्ष मुनि ‘जसराज’

तूं बीछड़ियौ त्यार

जिनहर्ष मुनि ‘जसराज’

सज्जन तो कारण सदा

जिनहर्ष मुनि ‘जसराज’

साजन गया सम्बाहि

जिनहर्ष मुनि ‘जसराज’

सयणे न लही सार

जिनहर्ष मुनि ‘जसराज’

हेमंत मालती रा सोरठा

रामसिंघ सोलंकी

दीह दुहेलौ जाइ

जिनहर्ष मुनि ‘जसराज’

चिति मिलवा री चाह

जिनहर्ष मुनि ‘जसराज’

सुगुणै सैण कियोह

जिनहर्ष मुनि ‘जसराज’

देखि सुरंगी डाळ

जिनहर्ष मुनि ‘जसराज’

वाइस उडी बलाइ ल्युं

जिनहर्ष मुनि ‘जसराज’

तन धन जोवन ताकतां

जिनहर्ष मुनि ‘जसराज’